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जयंती विशेष: बिहार का वो गांव, जहां रहते थे भारत के पहले राष्ट्रपति Dr Rajendra Prasad

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PATNA : भारत के गौरव और बिहार के सुपुत्र डॉ राजेंद्र प्रसाद (Dr Rajendra Prasad) का जन्म सारण जिले (अब सीवान) के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था. इनका जन्म एक बड़े सयुंक्त परिवार के सबसे छोटे सदस्य के रूप में हुआ, इसलिए इनका बचपन बहुत प्यार और दुलार से बिता. इनके पिता का नाम महादेव सहाय था, जो संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे. उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मशील महिला थीं. पाँच वर्ष की उम्र में उन्हे समुदाय की एक प्रथा के अनुसार उन्हें एक मौलवी को सौप दिया, जिन्होने उन्हे फ़ारसी सिखाई और फिर हिंदी और अंकगणित.

डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपनी प्राथमिक पढ़ाई छपरा जिला से की. राजेन्द्र प्रसाद का विवाह उस समय की प्रथा के अनुसार बाल्यकाल में ही, लगभग 13 वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया. विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष अकादमी से अपनी पढाई जारी रखी. उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके अध्ययन अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी.

साल 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया. उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. 1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ विधि मास्टर डिग्री (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की.

राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई का अभ्यास भागलपुर, बिहार में किया करते थे. 1926 ई० में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे. हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है. अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं. उन्होंने हिन्दी के ‘देश’ और अंग्रेजी के ‘पटना लॉ वीकली’ समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था.

भारतीय स्वतंत्रता आंदलोन में उनका आगमन वकील के रूप में अपने कैरियर की शरुवात करते ही हो गई थी, जब बिहार और बंगाल में बाढ़ आई तब राजेंद्र प्रसाद ने काफी बढ़ चढ़ कर सेवा -कार्य कार्य किया. बिहार के भूकंप के समय वह जेल में थे. जेल से दो वर्ष में छूटने के बाद वे भूकम्प पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन- मन से जुट गए. 1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने एक बार पुन: 1939 में संभाला था.

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला. राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे. हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था.

राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए उदाहरण बन गए. 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की. अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया.

अपने जीवन के अंतिम महीने बीतने के लिए उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना. बिहार की राजधानी मे (28 फरवरी 1963) उनकी जीवन की कहानी समाप्त हुई. यह कहानी थी हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति और बिहार के गौरव राजेंद्र बाबू की.

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