नई कलम साहित्य

Aman Aakash : दिल्ली है, सम्भल कर रहना

Aman-akash
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बिहार से, यूपी से, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ से नए-नए जवान हुए लौंडे दिल्ली जाते हैं. डीयू, जेएनयू, जामिया में एडमिशन मिला होता है. घरवाले कड़ी हिदायत देकर भेजे होते हैं ‘बेटे, दिल्ली जा रहे हो. पढ़ाई और ध्यान देना. इधर-उधर की चीजों में ज्यादा मन मत लगाना.’ पेरेंट्स के इस ‘इधर-उधर की चीज’ में बहुत-सी बातें समायी होती हैं. खैर वो जवानी ही क्या, जिसमें लौंडे घरवालों के कहने पर चले. दुनिया बदलनी है तो बगावत करना पड़ेगा. रिबेल बनना होगा.

दिल्ली में मिल जाता है कोई जो बड़ी लच्छेदार बातें करता है. जब भी बोलता है सिर्फ सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता, गरीबों के हक़, भगत सिंह, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की बातें टपकती हैं. जो बताता है कि अब क्रांति आने में चंद ही घण्टे शेष हैं. आइए आप भी इस यज्ञ में आहुति दीजिए. आपका भी नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. बच्चों को वह आदमी साक्षात देवता मालूम पड़ता है और उसकी हर बात देववाणी. भीड़ उमड़ पड़ती है उसके पीछे. कॉलेज के ज़रूरी असाइनमेंट छोड़कर बच्चे हाथ में तख्तियां लेकर चल पड़ते हैं उसके साथ. बच्चों को लगता है अब सब बदल जाएगा. कुछ तो बात है भैया में. भैया मतलब जादू हैं जादू. यहां तक कि बच्चा घरवालों को नहीं बताता कि वह जंतर-मंतर से पुलिसिया लाठी की निशान लेकर लौट रहा है.

बीत जाते हैं तीन साल. सँघर्ष, क्रांति, नारे, जुलूस, प्रेम कहानियां सब बीत जाती हैं. बच्चा अब एम.ए. में एडमिशन के लिए इधर-उधर भाग रहा है. कहीं एंट्रेंस नहीं निकल रहा तो कहीं इंटरव्यू से बाहर हो जा रहे. वहीं एक ओर क्रांति की बातें करने वाले उन भैया की राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है. भैया का उठना-बैठना अब बड़े लोगों के साथ एसी में होने लगा है. भैया का अपना आफिस बन चुका है. बच्चे को एमए में एडमिशन नहीं मिल रहा. सामाजिक न्याय की बातें करने वाले भैया अब राष्ट्रीय नेता बन गए हैं. क्रांति वाले यज्ञ में बाल्टी भर पानी डाला जा चुका है. बच्चा ठगा-सा महसूस कर रहा है. उसे अब पेरेंट्स की बातें याद आ रही हैं ‘दिल्ली है, सम्भल कर रहना. इधर-उधर की चीजों पर ध्यान मत देना.’

✍️ अमन आकाश (Aman Akash) , बिहार
असिस्टेंट प्रोफेसर, पीएचडी रिसर्च स्कॉलर
साभार : Facebook