साहित्य नई कलम

Aman Aakash : रेलवे स्टेशन की सुबह

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सुबह के पांच बजने वाले हैं। पर्यावरण का ब्राइटनेस निम्नतम है। रात भर की हांफती-भागती ट्रेन गंतव्य के आउटर पर खड़ी सिग्नल के इंतज़ार में है। मानो कह रही हो “मैं तो थक गयी भाई साब, आराम करने दो कुछ घड़ी।” बोगी में टक-टक बत्तियां जलने लगीं। लोगबाग जल्दी-जल्दी में चादर समेटने लगे हैं। कोई जूते बांध रहा तो कोई बेसिन के सामने खड़ा जल्दीबाजी में दांत घिस रहा है। कुछ सवारियां पहले से बैग-बंडल पैक कर दरवाजे पर आ खड़ी है। रात भर की यात्रा की थकान सबके चेहरे से स्पष्ट झलक रही है। सब घर पहुंच जाना चाहते हैं, जितनी जल्दी हो सके। कुछ सवारियां जो अभी भी निमग्न सोई हुई हैं, उनको कोई उठा नहीं रहा। अब वो स्टेशन पर ही ‘टिंग टोंग, यात्रीगण कृपया ध्यान दें’ सुनकर ही आंख मलते हड़बड़ी में उठेंगे और जूते हाथ में लिए धप्पाक से ट्रेन से कूदेंगे।

ट्रेन को अभी भी सिग्नल का इंतज़ार है। आखिरी पटरी के उस पार अंधेरे से निकलकर एक चायवाला भागा आ रहा है। एक हाथ में केतली, दूसरे में कप की कतार। ट्रेन को सिग्नल मिल गयी। लाल बत्ती हरी हो गयी। चायवाला पटरियों को फांदते हुए आखिरकार पायदान पर आकर लटक गया। ‘चाय गरम, गरम चाय, रामप्यारी चाय, अदरक-इलायची वाली चाय’ का नॉनस्टॉप रिंगटोन बजना शुरू हुआ और चायवाले ने इस भीड़ में भी अपने ग्राहक खोज ही लिए। गरम केतली, कपों का पुलिंदा, ऊपर वाली जेब में तुड़े-मुड़े बीसियों नोट और ज़िंदगी के बीच वह इतनी कुशलता से संतुलन बनाता निकलता रहा, मानो माँ की कोख से चक्रव्यूह भेदना सीखकर आया हो। भारतीय रेलवे की चाय में दूध की उपस्थिति के उतने ही चांस होते हैं, जितने विराट कोहली के टॉस जीतने के, फिर भी. कोस कर, गालियां देकर भी चाय और कोहली दोनों ही भारतीयों को बड़े प्यारे हैं।

ट्रेन मद्धिम चाल से स्टेशन में घुस रही है। जनरल बोगी वाले मूर्छित से दिख रहे, स्लीपर वालों में अर्द्धमूर्छा है, एसी वालों के चेहरों पर चमक है। एक ही ट्रेन, एक ही समय पर तीनों श्रेणियां प्लेटफॉर्म पर पहुंची है बस क्लास का फ़र्क़ है, पैसों का फ़र्क़ है। अभी भी सुबह का उजाला नहीं छाया है। कुली, वेंडर, यात्रीगण, कुत्ते सब स्टेशन पर इधर-उधर पसरे पड़े हैं। पुलिसवाला डंडे बजा-बजाकर उन्हें उठा रहा है। चाय गर्म, टिंग-टोंग, यात्रीगण कृपया ध्यान दें, कुली-कुली, पेपरवाले के शोर के बीच सवारियां धड़ाधड़ प्लेटफॉर्म से बाहर निकल रही हैं। एसी वालों की गाड़ियां बाहर इंतज़ार कर रही हैं, स्लीपर वाले ऑटोवालो से मोलभाव कर रहे। जनरल बोगी वाले बीवी-बच्चे-बैग-बोरियां समेत सीढ़ियों पर बैठ गए हैं। जब बस चलेगी तब निकलेंगे। स्टेशन के बाहर रेहड़ी वालों ने अंगीठी सुलगानी शुरू कर दी है। चायवाला अपनी केतली से कपों में ऐसे चाय उड़ेल रहा है जैसे वो सेंटीमीटर से मापकर चाय देगा। सुलभ शौचालय के बाहर लम्बी कतार लगी है। इस कतार में तनाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अंदर बैठा इंसान दुनिया का सबसे सुकूनभरा इंसान है, और तीसरे नम्बर पर खड़ा दुनिया का सबसे बड़ा अभागा महसूस कर रहा। दूसरे नम्बर वाला फिलहाल आशावादी है।

रिक्शेवाले अब चौकन्ने हो गए। ऑटोवालों की कलाबाजियां शुरू हो गयी। सवारियां बिठा-बिठाकर उदित नारायण की आवाज़ में ‘आखिर तुम्हें आना है, ज़रा देर लगेगी’ बजते हुए ऑटो दन्न से निकल रहे हैं। उजाला चढ़ने लगा है। कुछ देर पहले तक सुनसान पड़ी सड़क पर वाहनों का रेला लग गया। जनरल बोगी वाले भी अब सरक-सरक के बस स्टैंड में आ रहे हैं। रेलवे स्टेशन की सुबह अब बीत रही है। दिन चढ़ने लगा है। अगली सुबह फिर कोई ट्रेन आएगी। फिर सवारियां हड़बड़ी में होंगी। फिर कोई चायवाला अंधेरे को चीरते हुए भागता आकर ट्रेन की पायदान से लटक जाएगा।

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✍️ अमन आकाश (Aman Akash) , बिहार
असिस्टेंट प्रोफेसर, पीएचडी रिसर्च स्कॉलर
साभार : Facebook