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Digital World का केरोसिन फैन

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अगर अभी मैं आपसे पूछूं की आप इस तपती हुई गर्मी में अपने आप को किस तरह से कूल रखते हैं तो आप पंखा, ac, कूलर के इस्तेमाल की बात करेंगे। मगर क्या कभी आपने सोचा है की आज से 200 साल पहले जब बिजली नहीं थी तो मानव जाति अपने आप को इस गर्मी से कैसे बचाते होंगे ? ac, कूलर आने से पहले फैन ही सबसे सस्ती चीज़ मानी गयी है। उत्तराखण्ड का शहर रुड़की की शान न केवल IIT से है बल्कि इलाके के कई बिना डिग्री के बेहतरीन अनुभव रखने वाले लोगों से भी हैं। जी हां, रुड़की के कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके आविष्कार को आज पूरी दुनिया में अलग पहचान मिल रही है। ऐसा ही एक आविष्कार इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, रुड़की के रहने वाले एक शख्स ने 200 साल पुराने पंखे को रेनोवेट किया है। यह पंखा केरोसिन यानी कि मिट्टी के तेल से चलता है। आइये चलते हैं और जानते हैं की आखिर कोई, पंखा मिट्टी के तेल से कैसे चल सकता है।

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अंग्रेजों के जमाने से अपनी अलग पहचान रखने वाली शिक्षानगरी रुड़की वर्तमान में भी अपनी प्राचीन पहचान को कायम रखने में सफल है। इन दिनों केरोसिन फैन को लेकर रुड़की देशवासियों के बीच चर्चा में है। यहां के अरशद मामून नामक व्यक्ति ने यह केरोसिन फैन बनाया है। भाप से चलने वाले इस पंखे की चर्चा आज केवल देश में ही नहीं विदेश में भी हो रही है। यह पंखा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वोकल फॉर लोकल की मुहिम को भी आयाम देता है। साथ ही यह पंखा प्रसिद्ध कहावत “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” को भी यतार्थ करता है।

असल में यह पंखा करीब 200 साल पुराने पंखे को रेनोवेट कर तैयार किया गया है। अरसद ने 200 पुराने पंखे को नया रूप दिया है। इतने पुराने पंखे को एक नया रूप देना कोई आसान काम नहीं है।

रुड़की में रहने वाले अरशद मामून बताते हैं कि उनके पूर्वजों से यह पंखा उन्हें मिला है। इस पंखे को देखकर उन्होंने कुछ ऐसे ही भाप से चलने वाले पंखे को रेनोवेट किया है। पंखे की मांग देश के अलावा विदेश में भी है। अरशद मामून बताते हैं कि इसी पंखे से उनका कारोबार शुरू हुआ। लंबे अरसे से यह पंखा परिवार के भरण-पोषण का जरिया बना हुआ है। यह भाप का पंखा केरोसिन से चलता है। पहले पंखे के नीचे वाले हिस्से में तेल डालकर दीये के रूप में जलाया जाता है। इसके बाद पिस्टन की मदद से इसको चलाया जाता है। यह भाप चालित पंखा मायानगरी मुंबई के लोगों को खूब रास आता है। स्पीड कम होने के कारण ज्यादातर लोग इसे शोपीस के रूप में रखते हैं।

करीब 200 साल पहले जब ये पंखा वजूद में आया होगा तो शायद बिजली का किसी ने नाम भी न सुना हो। मगर आज जब पूरी दुनिया लाइट से जगमगा रही है, तो ऐसे समय भी इस भाप और केरोसिन चालित पंखे की चमक कम नहीं हुई है। पहले यह सम्पन्न लोगों की गर्मी दूर भगाने के काम आता था। आज कमजोर वर्ग भी इसका लाभ ले सकता है।

अरशद, अच्छे-अच्छों इंजीनियर्स को मात देने का हुनर रखते हैं। रुड़की में अरशद का एक छोटा सा वर्कशॉप है। बड़े संस्थानों के छात्र मॉडल तैयार कराने से लेकर प्रैक्टिकल के लिए अरशद की इस छोटी सी वर्कशॉप में आते हैं। बचपन से इंजीनियर का हुनर रखने वाले अरशद का कहना है कि बिना इंजीनियरिंग की पढ़ाई और बिना डिग्री के यह अनुभव उन्हें उनके पुरखों से मिला है। दरअसल, ब्रिटिश कॉल के दौरान इजाद हुए इस पंखे को आजादी के बाद से मुनासिब पहचान नहीं मिल पाई, जबकि ये भाप चलित पंखा विदेश में भी अपनी खास पहचान रखता है।

अरशद के टैलेंट और इस पंखे की नायब कारगरी को देख कर तो ऐसा ही लगता है की ये दोनों अपने आप में ही अद्भुत हैं।