संस्कृति

माता चंद्रघंटा के ध्यान से होता है मन शांत और एकाग्र

chandra ghanta
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नवरात्रे के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है।माँ दुर्गा का ये स्वरुप शांतिदायक और कल्याणकारी है। रूप परम आनंद प्रदान करने वाला है। कहा जाता है की देवी के इस रूप की सदैव ध्यान करनी चाहिए , माता के ध्यान से मन शांत रहता है। माता के इस स्वरुप को वैष्णो देवी में पूजा जाता है, शास्त्रों के अनुसार माता को हिन्दू धर्म में काफी मान्यता दी गयी है। माता के शरीर का रंग सोने सा चमकीला है और माथे पर घंटे के आकर का चंद्र है। माता का ये रूप भक्तों के लिए काफी मनमोहक है और शांति और सद्गति प्रदान है।

शास्त्रों के मुताबिक प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों के बीच लम्बे समय से युद्ध हो रहा था। तब देवताओं के स्वामी इंद्र और असुरों का स्वामी महिषासुर था। महिषासुर ने युद्ध में देवताओं को हराकर इंद्र का सिंघासन ले लिया था और स्वर्गलोक पर राज करने लगा था। इनसब चीजों को देख कर देवता काफी परेशान हो गए और वहां पहुंचे जहाँ त्रिदेव विराजमान थे।

देवताओं ने अपना सारा वृतांग ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बताया। देवतों ने कहा हे! त्रिदेव महिषासुर ने इंद्र, वायु, चंद्र, सूर्य और अन्य सभी देवताओं के यज्ञ भाग छीन कर खुद राज कर रहा है और देवतओं को भी बंधक बना लिया है, और उसके असुर पृथ्वी पर विचर रहें है। ये सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर को बहुत गुस्सा आया और मारे क्रोध का उनका पार न रहा। गुस्से की वजह से तीनो देवताओं के मुख से एक तेज ऊर्जा उत्पन हुई और एक जगह जा कर मिल गयी ऐसी ही ऊर्जा बाकि देवताओं के मुख से निकला और सारी ऊर्जा एक जगह जा कर मिल गयी और एक देवी के रूप में परिवर्तित हो गयी। जो दसों दिशा में वयाप्त थी।

भगवन शंकर ने देवी को त्रिशूल प्रदान किया और विष्णु ने देवी को चक्र प्रदान किया। ऐसे ही सारे देवतावों ने देवी को अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। इंद्र ने अपना व्रज और ऐरावत हाथी का एक घंटा उतार कर देवी को दिया और सूर्य ने देवी को अपना तेज और तलवार प्रदान किया है और वाहन के लिए शेर दिया। इसी कारण देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा।

जब देवी अपने वाहन के साथ महिषासुर के साथ युद्ध करने आई तो महिषासुर देवी के रूप को देखकर समझ गया की उसका काल नजदीक है। महिषासुर ने देवी के ऊपर अपनी सारी सेना को हमला करने क लिए छोर दिया। देवी ने छन भर में सारे सेना को खत्म कर दिया। देवी ने महिषासुर और बाकियों का संहार कर दिया।

पूजा विधि :-

तीसरे दिन की पूजा में माता की चौकी पर माता चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।

इसके बाद पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा सहित समस्त स्थापित पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, आदि करें। बाद प्रसाद वितरण कर पूजा संपन्न करें।

भोग में क्या लगाए :-

मां चंद्रघंटा को दूध और उससे बनी चीजों का भोग लगाएं और और इसी का दान भी करें। ऐसा करने से मां खुश होती हैं और सभी दुखों का नाश करती हैं। इसमें भी मां चंद्रघंटा को मखाने की खीर का भोग लगाना श्रेष्ठ माना गया है।