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Bihar के इस फल से नहीं आएगा बुढ़ापा, सरकार द्वारा सत्यापित

Kala-Amrud
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खेलता-कूदता, मनचला बचपन सबको प्यारा लगता है। मस्त जवानी की शान ही निराली होती है। परन्तु कम्बख्त ये बुढ़ापा किसी को अच्छा नहीं लगता। बुढ़ापा मनुष्य की उम्र का वो पड़ाव है, जिससे हर किसी को गुजरना होता है। हर कोई यही चाहता है की उसे कोई जादू की छड़ी मिल जाये जिससे उसे कभी बुढ़ापा ना आये। आपको कैसा लगेगा अगर आपको वो जादू की छड़ी मिल जाये ? दरअसल, बिहार के कृषि विश्वविद्यालय ने एक ऐसा फल उगाया है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह बुढ़ापा रोकने में सहायक होता है। तो आइये चलते हैं और जानते हैं इस चमत्कारी फल के बारे में।

Bihar के भागलपुर में पहली बार एक ऐसे फल का उत्पादन शुरू हुआ है, जो अपनी अनोखी किस्म से लोगों का ध्यान खींचा रहा है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) में उगाया गया काला अमरूद बहुत ही लाभदायक है। इस चमत्कारी फल से लोगों को इम्युनिटी बढ़ाने में मदद मिलेगी और उन्हें बुढ़ापा भी देर में आएगा। इस अमरूद में बीमारियों से लड़ने की क्षमता ज्यादा है।

आपको बता दे की इस काले अमरुद में एंटी-एजिंग फैक्टर और रोग प्रतिरोधक क्षमता है, यानी की ये बुढ़ापे को रोकने और बिमारियों से लड़ने में कारगर है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, काले अमरूद की इस विशेष किस्म के अंदर लाल गूदा होता है, जिसे मिनरल्स और विटामिन से भरपूर होने का दावा किया जा रहा है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है जिससे यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बुढ़ापा रोकने में कारगर है। आप यूँ समझ सकते हैं की 100 ग्राम अमरूद में लगभग 250 मिलीग्राम विटामिन-सी, विटामिन-ए और बी, कैल्शियम और आयरन के अलावा अन्य मल्टीविटामिन और मिनरल्स होते हैं।

इस फल की चर्चा अब दूर-दूर तक हो रही है। आपको बता दे की इस फल का अभी व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस फल को विश्वविद्यालय ने दो साल पहले लगाया गया था और अब जाकर इसमें फल आ रहे हैं। इसे साइंटफिक रिसर्च के साथ विकसित किया गया है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय में पहली बार इसका फल लगा है। ये अमरूद अगस्त के अंत तक या फिर सितंबर तक पूरी तरह से पक जाएगा। एक अमरूद औसतन सौ-सौ ग्राम के आसपास का माना जा रहा है। यहां की मिट्टी व वातावरण इस फल के लिए उपयुक्त है। इसके आकार, सुगंध में कुछ सुधार के बाद जल्द ही इसे व्यावसायिक खेती के लिए लॉन्च किए जाने की संभावना है।

जवानी में मीलों तक मजे से चलने वाले पैर, बुढ़ापे में थोड़ी दूर चलने पर ही थक जाते हैं। बिहार की धरती पर उगाया गया यह फल, लोगों के लिए, बुढ़ापा रोकने की ‘संजीवनी बूटी’ साबित हो सकती है।