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Sharad Kumar : पहला बिहारी जिसने पैरालंपिक में लहराया तिरंगा

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जब टूटने लगे हौसला तो बस ये याद रखना,
बिना मेहनत के हासिल तख्त-ओ-ताज नहीं होते।

ढूँढ लेना अँधेरे में अपनी मंजिल
क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते।

सफलता की साधना विश्वास पर डिपेंड करती है, और इसी विश्वास ने आज बिहार के बेटे को पैरालंपिक में मेडल हासिल करने में मदद की। बिहार के शरद कुमार (Sharad Kumar) शान से तिरंगा लहराते नज़र आएं क्योंकि उन्होंने टोक्यो में चल रहे पैरालंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता है। अभ्यास के दौरान चोटिल होने के कारण वे अपना नाम वापस लेने की सोच रहे थे। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने मंज़िल की ओर बढ़ते चले गए।

मुजफ्फरपुर के मोतीपुर निवासी शरद, टोक्यो पैरालिंपिक (Tokyo Paralympics) में हाई जंप के T63 इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर बिहार का नाम रोशन किया है। उन्होंने खेलों के सबसे बड़े मंच पर मेडल जीतकर वह सपना पूरा किया जो सालों से उनकी आंखों में बसा हुआ था। उन्होंने हाई जंप की 63 स्पर्धा में 1.83 मीटर की छलांग लगाई और ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम दर्ज किया। उनकी कड़ी मेहनत, स्पर्धा के लिए जुनून और उनके दृढ़ निश्चय ने ही आज उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाया है।

इस जीत का आज जो शरद जश्न मना रहें हैं, उसके एक रात पहले उन्हें ऐसा लग रहा था की वो इस पैरालंपिक में पार्टिसिपेट ही नहीं कर पाएंगे और वो तो इस खेल से अपना नाम वापस लेने की सोच रहे थे। प्रैक्टिस के दौरान उनके घुटने में चोट लग गयी थी। उनकी हिम्मत टूटती जा रही थी। उन्होंने पटना में अपने घर पर फ़ोन किया और अपने माता-पिता से बात की। उनके पिता ने उन्हें भगवद गीता पढ़ने और कर्म पर ध्यान लगाने को कहा। जब शरद भावुक होकर रोने लगे तब माँ ने उन्हें हिम्मत देते हुए कहा की मर्द को दर्द नहीं होता। वे अपने अंदर झांककर देखे।

शरद बहुत छोटे थे जब वे गलत दवा के सेवन के कारण पोलियो से ग्रसित हो गए और उन्हें लकवा मार दिया। उनके माता-पिता इस घटना के बाद टूट गए लेकिन उन्होंने बेटे को पढ़ाई पर ध्यान लगाने को कहा। इसके लिए उन्होंने बेटे को खुद से दूर दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल (Modern School) और किरोड़ीमल (Kirori Mal) कॉलेज से तालीम लेने वाले शरद ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (Jawaharlal Nehru University) से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मास्टर्स डिग्री हासिल की है।

शरद पढ़ाई में जितने अच्छे थे खेल के उतने ही शौकीन थें। शुरुआत में जब वह अभ्यास करते थे तो बच्चे उनका मजाक उड़ाते थे इसी वजह से वह अकेले में अभ्यास करते थे। उन्होंने 2000 की शुरुआत में दार्जिलिंग के राज्य चैंपियनशिप जीती। वहीं साल 2008 में उन्होंने अपना पहला नेशनल मेडल जीता था। जब पिछले पैरालिंपिक में शरद को छठा स्थान आया, तभी से शरद ने ठान लिया था की मेडल लेकर ही लौटना है। भगवान ने उनके समर्पण, जुनून और मेहनत का फल उन्हें दिया।

शरद की इस जीत का कायल सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि पूरा देश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) ने शरद की इस शानदार सफलता पर बधाई देते हुए ट्वीट किया, “शरद कुमार ने कांस्य पदक जीतकर हर भारतीय के चेहरे पर मुस्कान ला दी है। उनका जीवन कई लोगों को प्रेरित करेगी। उन्हें बधाई।” वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने भी बिहार के लाल शरद कुमार को उनके इस जीत के लिए बधाई देते हुए ट्विटर पर ट्वीट करते हुए लिखा, “बिहार के लाल श्री शरद कुमार को टोक्यो पैरालंपिक 2020 के हाई जंप स्पर्धा में भारत के लिए कांस्य पदक जीतने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। मेरी कामना है कि वे ऐसे ही राज्य एवं देश का नाम रोशन करते रहें।”

इस पैरालंपिक में बिहार की ऊँची छलांग देखने को मिली है। शरद, पहले बिहारी बन गए हैं, जिन्होंने बिहार के तरफ से अपने देश के लिए पदक हासिल की है। बिहार में हुनर तो है पर उसे दिखाने के लिए सही प्लेटफार्म बनाने की ज़रूरत है। अगर, बिहार सरकार खेल के तरफ थोड़ा सा ध्यान दे तो फिर हमारे भी राज्य से विराट, नीरज और सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ी निकलकर, देश का नाम रोशन करेंगे।