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Maglev Train : हवाई जहाज से भी तेज़ है इस ट्रेन की रफ़्तार

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आपने रेल की पटरी पर, पहियों के साथ चलने वाली ट्रेन के बारे में सुना होगा। हवा से बात करने वाले एरोप्लेन के बारे में सुना होगा। पर क्या आपने कभी ये सोचा है की हवा से बात करने वाली कोई ट्रेन हो, जो धरती को बिना छुए, तेज़ रफ़्तार से दौरे। दरअसल दुनिया में एक ऐसा ट्रेन बनाया गया है जो ट्रैक और ट्रेन की बॉडी के बीच बिना संपर्क के, तैरती हुई लगती है। आपको मैं बता दूँ की ये फ्लोटिंग ट्रेन, जिसे मैग्लेव ट्रेन (Maglev Train) कहा जाता है, दुनिया की सबसे तेज ट्रेन है। आप यूँ समझ लीजिये की आप एक घंटे में दिल्ली से लखनऊ पहुंच जायेंगे।

दुनिया की सबसे तेज दौड़ने वाली ट्रेन की शुरुआत कर दी है। हवा की रफ्तार से फर्राटे भरने वाली इस ट्रेन की अधिकतम रफ्तार 600 किलोमीटर प्रति घंटे की है। यह ट्रेन 1,500 किलोमीटर के दायरे में यात्रा की दृष्टि से सबसे अच्छा सॉल्यूशन है। बता दें की इस हाई टेक ट्रेन की शुरुआत चीन ने की है। इसे चीन के शहरों में चलाया जायेगा। बीजिंग से शंघाई तक की बीच की दूरी 1,000 किमी से ज्यादा है। इस हाई स्पीड ट्रेन से दोनों शहर की यात्रा करने में केवल ढाई घंटे का वक्त लगेगा, वहीं हवाई जहाज से, शंघाई से बीजिंग जाने में करीब 3 घंटे का वक्त लगता है।

शुरूआत में शंघाई शहर से चेंकदू शहर के बीच इस ट्रेन को चलाया जाएगा। इस मैग्लेव ट्रेन (Maglev Train) परियोजना की शुरुआत अक्टूबर, 2016 में हुई थी और इसका प्रोटोटाइप 2019 में बनाया गया था। इस ट्रेन की लंबाई करीब 69 फीट है।

इस नई मैग्लेव ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम की सार्वजनिक तौर पर शुरुआत चीन के तटीय शहर किंगदाओ में हुई है। इस ट्रेन का सफल परीक्षण जून, 2020 में हुआ। इस ट्रेन में 10 डिब्बे लगाए जा सकते हैं, जिसमें प्रत्येक की क्षमता 100 यात्रियों की होगी, यानी एक बार में 1000 यात्री इस ट्रेन से कुछ मिनट में ही काफी दूरी तय कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कोई आवाज़ नहीं होगी और इसकी यात्रा भी काफी सुरक्षित होगी।

मैग्लेव ट्रेन, जिसका मतलब होता है magnetic levitation वाला ट्रेन। जेनेरल ट्रेनों की तरह मैग्लेव ट्रेन के पहिए रेल ट्रैक के संपर्क में नहीं आते हैं और इसलिए इस ट्रेन को ‘फ्लोटिंग ट्रेन’ भी कहा जाता है। इन तेज रफ्तार रेलगाड़ियों को दौड़ने के लिए न पहिए चाहिए, न एक्सल, न बियरिंग।

जेनेरल ट्रेनों की तरह मैग्लेव ट्रेन के पहिये, रेल ट्रैक के संपर्क में नहीं आते हैं और यह आसानी से स्टार्ट और बंद की जा सकती है। डॉल्फिन जैसी चपटी ‘नाक’ वाली ये गाड़ियां high temperature superconducting पॉवर पर चलती है जिससे लगता है कि यह चुंबकीय ट्रैक्स पर तैर रही हो। इस हाई टेक ट्रेन सेवा की शुरुआत लंबी दूरी के सफर को ध्यान में रखते हुए की गई है।

पिछले 20 सालों से चीन इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। वैसे ये भी उम्मीद जताई जा रही है की ऐसी ही एक मैग्लेव ट्रेन भारत में भी दौड़ती नजर आएगी। अगर, ये टेक्नोलॉजी भारत आ गयी तो इस अधिक आबादी वाली देश में लगने वाली भीड़ के दौरान, हुए देरी से, समय की बहुत बचत होगी।