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जानिए Taliban की दशहत की खौफनाक कहानी

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इन निगाहों में एक खौफ है आज
कब ख़त्म ये अँधेरा होगा।

हथेली पर जान लिए चल रहे हैं
कब आज़ाद सवेरा होगा।

आज जिस दौर से अफगानिस्तान (Afghanistan) गुज़र रहा है वो दृश्य दिल दहला देने वाली है। एक डर जो मन में कहीं छिपा बैठा था कि तालिबान (Taliban) के वापस आते ही दमन और अत्‍याचारों का दौर शुरू होगा, वह अब सच साबित हो रहा है। 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने राजधानी काबुल समेत पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। धीरे-धीरे अब वहां पर तालिबान की सरकार अपना पैर फैला रही है। लेकिन आखिर ये तालिबान है क्या, कोई व्यक्ति, कोई समुदाय या फिर कोई वस्तु ? आइये चलते हैं और जानते हैं तालिबान की पूरी दास्तान।

ये बात 1980 के शुरुआती दिनों की है, जब अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन की सेना आ चुकी थी। कई मुजाहिदीन समूह, सेना और सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे। फिर दिन गुज़रे, तारीखे बदली और 1989 तक सोवियत यूनियन ने अपनी सेना वापस बुला ली। लेकिन बाद में स्थिति ऐसी हुई की इसके खिलाफ लड़ने वाले लड़ाके अब आपस में ही लड़ने लगे। इसी बीच लोग मुजाहिद्दीनों से भी परेशान थे। तब उदय हुआ तालिबान का, जिसे लोग मसीहा समझने लगे और उनका स्वागत किया।

आपको बता दें की इस तालिबान शब्द का भी एक मतलब है। पश्तो भाषा में मदरसों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को तालिबान कहते हैं। ये संगठन सुन्नी समुदाय का प्रचार करता है। उत्‍तरी पाकिस्‍तान में सुन्‍नी इस्‍लाम का कट्टरपंथी रूप सिखाने वाले एक मदरसे में तालिबान का जन्‍म हुआ।

शुरु शुरु में लोग तालिबान को मुजाहिदीनों के मुकाबले ज़्यादा पसंद करते थे क्योंकि उन्होंने भ्रष्ट्राचर पर लगाम कसी, अव्यवस्था पर अंकुश लगाया और अपने नियंत्रण में आने वाले इलाक़ों को सुरक्षित बनाया। मगर तालिबान के हिंसक रवैये और इस्‍लामिक कानून वाली क्रूर सजाओं ने जनता में आतंक फैला दिया। इसी दौरान दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव तेजी से बढ़ा। 1995 में तालेबान ने ईरान सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्ज़ा किया और फिर ठीक इसके एक साल बाद अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल पर कब्ज़ा जमाया। इसी बीच तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान को इस्लामिक अमीरात घोषित कर दिया।

क़ाबुल पर कब्ज़ा ज़माने के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति रहे बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटा दिया और फिर मुल्ला मोहम्मद उमर को अमीर अल मोमिनीन यानी की आम भाषा में राष्ट्रपति बनाया गया। ये मुल्ला मोहम्मद उमर वही व्यक्ति है जिसने कुछ पश्तून युवाओं को साथ लेकर तालिबान आंदोलन शुरू किया। आपको बता दे की साल 1998 आते-आते, क़रीब 90 प्रतिशत अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था।

तालिबान को पैसों की कोई कमी नहीं। इसे हर साल एक बिलियन डॉलर से ज्‍यादा की कमाई होती है। अगर हम तालिबान के कमाई की सोर्स की बात करें तो उसे सबसे ज़्यादा कमाई अफीम की खेती से होती है। दुनिया की 80% अफीम का उत्पादन अकेले अफ़ग़ानिस्तान में होता है। अफीम का कारोबार करने वालों से तालिबान टैक्स वसूलता है। अफ़ग़ानिस्तान में अवैध खनन करने वाली कंपनियों से भी तालिबान टैक्स वसूल कर अपना कमाई निकालता है। इसके अलावा रंगदारी, चंदा, निर्यात, रूस, ईरान, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब जैसे देशों से मदद भी तालिबान की कमाई का सोर्स है।

ये एक विडंबना ही हैं की लोग धर्म को कोसते हैं लेकिन व्यक्ति विशेष को नहीं। ये मूर्खता है जब लोग क्रिमिनल विचारों वाले दिमाग के बजाय पूरे मानव समाज को दोष देते हैं। तालिबान का कहना था कि वो वहाँ शांति और सुरक्षा का माहौल लाएगा। लेकिन कुछ ही समय बाद तालिबान लोगों के लिए सर दर्द साबित हो गया। उसने कुछ ऐसे कानून लाये जो लोगों के लिए पैरों की बेड़ी बन गए।

तालिबान ने शरिया कानून के मुताबिक अफगानी पुरुषों के लिए बढ़ी हुई दाढ़ी और महिलाओं के लिए बुर्का पहनने का फरमान जारी कर दिया था। संगीत, टीवी और सिनेमा पर रोक लगा दी गई। इन कानूनों ने सबसे ज्यादा महिलाओं को प्रभावित किया। अफगानी महिला को नौकरी करने की इजाजत नहीं दी जाती थी। दस साल की उम्र के बाद लड़कियों के लिए स्कूल जाने पर मनाही थी। लड़कियों के लिए सभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दरवाजे बंद कर दिए गए थे। किसी पुरुष रिश्तेदार के बिना घर से निकलने पर महिला का बहिष्कार कर दिया जाता था। इसके साथ ही महिलाओं पर नर्स और डॉक्टर्स बनने पर भी पाबंदी थी।

इन सभी के बीच दुनिया का ध्यान तालिबान की ओर तब गया जब न्यूयॉर्क में 2001 में हमले हुआ। 11 सितंबर 2001 को 19 आतंकियों ने अमेरिका के 4 यात्री विमानों को हाईजैक किया। इनमें से दो विमानों को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, 1 विमान को पेंटागन और 1 विमान अज्ञात जगह में क्रैश करा दिया गया। इस हमले के पीछे अल कायदा का हाथ था।

हमले के मुख्य संदिग्ध ओसामा बिन लादेन और अल क़ायदा के लड़ाकों को शरण देने का आरोप तालिबान पर लगा। अमेरिका ओसामा बिन लादेन के खून का प्यासा हो गया। ओसामा पहले सूडान में छिपा था, उसके बाद उसने अफगानिस्तान में पनाह ली और उस वक्त वहां तालिबान का शासन था। सात अक्टूबर, 2001 को अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन नाटो ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और दिसंबर के पहले सप्ताह में तालिबान का शासन ख़त्म हो गया। हालाँकि, ओसामा बिन लादेन और तब तालिबान प्रमुख रहे मुल्ला मोहम्मद उमर को पकड़ा नहीं जा सका। तालिबान गुट के कई लोगों ने पाकिस्तान के क्वेटा शहर में पनाह ली।

पिछले कुछ समय से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का दबदबा फिर से बढ़ा है। भारी संख्या में विदेशी सैनिकों की मौजूदगी के बाद भी तालिबान ने धीरे-धीरे खुद को मज़बूत किया और अफ़ग़ानिस्तान में अपने प्रभाव को बढ़ाया।

सितंबर, 2012 में तालिबान लड़ाकों ने काबुल में कई हमले किए और नाटो के कैंप पर भी धावा बोला। 2013 में यूएस के ड्रोन हमले में तालिबान के सबसे बड़े नेता हकीमुल्लाह मसूद की मौत हो गयी, जिसके बाद मुल्ला मंसूर को नया नेता चुना गया। मुल्ला मंसूर की हत्या भी अमेरिकी ड्रोन हमले में मई 2016 को हुई और उसके बाद संगठन की कमान उनके डिप्टी रहे मौलवी हिब्तुल्लाह अख़ुंज़ादा को सौंपी गई।

कई दौर की बातचीत के बाद फरवरी, 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हुआ। इसमें अमेरिकी सेना को 14 महीने में अफगानिस्तान छोड़ना था। अब अमेरिकी सेना के देश छोड़ने के साथ ही तालिबान की क्रूरता अपने चरम पर पहुंचने लगी।

तालिबान ने कुछ ही दिनों में पूरे अफगानिस्तान देश पर कब्जा कर अफगान सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। स्थिति बिगड़ते देख अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर चले गए हैं। तालिबान ने इसी आड़ में राष्ट्रपति के पैलेस में कब्ज़ा जमा लिया। सोशल मीडिया पर कई पिक्चर वायरल हो रहे हैं जिसमें हथियारबंद लड़ाकों को राष्ट्रपति भवन में टहलते देखा जा सकता है। लोग तालिबान की क्रूरता से बचने के लिए अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। काबुल हवाईअड्डे पर देश छोड़ने के लिए उमड़ रही भारी भीड़ से यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि लोग किस हद तक तालिबान से भयभीत हैं। इसी बीच काबुल एयरपोर्ट से एक वीडियो काफी वायरल हुआ था जिसमें विमान के अंदर जगह न होने पर कुछ यात्री लटकते हुए देश छोड़कर जाने की सोचे पर जब विमान ने हवा में उड़ान भरी तो ये लोग आसमान में से नीचे गिरने लगे।

तालिबान की यह दास्तान, एक तरह से उसके क्रूरता का आईना दिखाती है। तालिबान के वजूद में आने से भारत सहित पूरे दुनिया पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा, ये तो अब आने वाला समय ही बताएगा। सदियों से हम यही देखते आ रहे हैं की सत्ता का युद्ध अक्सर बन्दुक से ही जीता जाता है। हिंसावादियों की यही कोशिश रहती है की अहिंसा उसके आगे हाथ बांधे खड़ी रहे और अंत में कटने के लिए अपना माथा झुका दे।