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अब पानी बर्बाद करना पड़ेगा महंगा

जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन, नदी विकास व गंगा कायाकल्प के तहत केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 की धारा 5 के तहत एक अधिसूचना जारी की है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) के नए निर्देश के मुताबिक पीने योग्य पानी का दुरुपयोग भारत में एक दंडनीय अपराध होगा जिसके तहत एक लाख रुपये तक का जुर्माना और पांच वर्ष तक की जेल की सजा भी हो सकती है। यह कानून सभी पर लागू होगा चाहे वह जल बोर्ड, जल निगम, जल कार्य विभाग, नगर निगम, नगर परिषद, विकास प्राधिकरण, पंचायत या कोई अन्य निकाय हो।

दरअसल, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राजेंद्र त्यागी एंड फ्रेंड्स (एनजीओ) की ओर से 24 जुलाई 2019 को पानी की बर्बादी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 15 अक्टूबर 2019 को केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) को आदेश दिया था कि वह पीने के पानी और भूगर्भ जल के दुरुपयोग को रोकने के लिए निर्देश जारी करें। इसके बाद सीजीडब्ल्यूए ने एनजीटी के आदेश का अनुपालन कर 8 अक्तूबर 2020 को सभी राज्यों को पत्र लिखा।

2025 तक प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 25 प्रतिशत की कमी के साथ, केंद्र ने भूजल को बर्बाद करने के लिए दंड सहित कठोर उपायों के साथ तंत्र को विकसित करने और लागू करने के लिए सभी राज्यों को भी लिखा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय को निर्देश दिया था कि नियामकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पानी की बर्बादी हानिकारक है और इस तरह के अपव्यय की लागत वसूल की जानी चाहिए।

राजेंद्र त्यागी एंड फ्रेंड्स ने अदालत को बताया कि हर एक दिन में 4,84,20,000 क्यूबिक मीटर पानी बर्बाद होता है। देश की लगभग 163 मिलियन आबादी कुछ अन्य के हाथों ताजे, पीने योग्य पानी से वंचित हो रही है, जिन्हें पीने योग्य पानी को बर्बाद करने और दुरुपयोग करने की लगभग आदत है। देश में लगभग 600 मिलियन लोग अत्यधिक पानी के तनाव का सामना कर रहे हैं। फ्लशिंग सिस्टम भी घरों और कमर्शियल परिसरों में ताजे पीने योग्य पानी की बर्बादी का एक प्रमुख कारण है, जिसमें एक ही फ्लश में लगभग 15-16 लीटर पानी की बर्बादी होती है।