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सर रमन की वह खोज जो आज भी जीता है अपना दौर

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भौतिक शास्त्री सर सीवी रमन का आज जन्मदिन है। उनका पूरा नाम चंद्रशेखर वेंकट रमन है। उनका जन्‍म ब्रिटिश भारत में तत्‍कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी (तमिलनाडु) में 7 नवंबर 1888 को हुआ था। वह सिर्फ भारतीयों के लिए हीं नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। विज्ञान के क्षेत्र में भारत को ऊंचाइयों तक ले जाने में उनका काफी बड़ा योगदान रहा है। उनके माता-पिता ‘चंद्रशेखर रामनाथन अय्यर’ और ‘पार्वती अम्मल’ हिंदू तमिल मूल के हैं। वह आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थें। उनके पिता एस.पी.जी. कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक थे।

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापट्टनम में ही हुई। सीवी रमन ने तत्कालीन मद्रास के प्रेसीडेन्सी कॉलेज से बीए किया और 1905 में वहां से गणित में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वह अकेले छात्र थे। उन्हें भौतिकी में स्वर्णपदक दिया गया। इसी कॉलेज में उन्होंने एमए में प्रवेश लिया और मुख्य विषय भौतिकी को चुना। उन्हें श्रीमती ‘एनी बेसेंट’ के भाषण सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ।

सीवी रमन ने प्रकाश प्रकीर्णन के क्षेत्र में अविस्‍मरणीय योगदान दिया। इसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार ग्रहण करने वाले वे भारत ही नहीं बल्कि एशिया के पहले वैज्ञानिक थे। उन्होंने 28 फरवरी 1928 को भौतिकी के गंभीर विषय में एक महत्वपूर्ण खोज की थी। रमन को उनकी खोज ‘रमन प्रभाव’ के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इस खोज के सम्मान में 1986 से, इस दिन को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस साल के राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का थीम ‘Women in Science’ था।

रमन प्रभाव का उपयोग आज भी वैज्ञानिक क्षेत्रों में किया जा रहा है। जब भारत से अंतरिक्ष मिशन चंद्रयान ने चांद पर पानी होने की घोषणा की तो इसके पीछे भी रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का ही कमाल था। फॉरेंसिक साइंस में भी रमन प्रभाव काफी उपयोग साबित हो रहा है। अब यह पता लगाना आसान हो गया है कि कौन-सी घटना कब और कैसे हुई थी। सीवी रमन ने जिस दौर में अपनी खोज की थी उस समय काफी बड़े और पुराने किस्म के यंत्र हुआ करते थे। रमन ने रमन प्रभाव की खोज इन्हीं यंत्रों की मदद से की थी। आज रमन प्रभाव ने ही तकनीक को पूरी तरह बदल दिया है। अब हर क्षेत्र के वैज्ञानिक रमन प्रभाव के सहारे कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं।

रमन का वाद्य-यंत्रों की भौतिकी का ज्ञान इतना गहरा था कि 1927 में जर्मनी में छपे बीस खंडों वाले भौतिकी विश्वकोश के आठवें खंड का लेख रमन से ही तैयार कराया गया था। इस कोश को तैयार करने वालों में रमन ही ऐसे थे, जो जर्मनी के नहीं थे।

सीवी रमन ने स्टील की स्पेक्ट्रम प्रकृति, स्टील डाइनेमिक्स के बुनियादी मुद्दे, हीरे की संरचना और गुणों और अनेक रंगदीप्त पदार्थो के प्रकाशीय आचरण पर भी शोध किया। रमन 1948 में भारतीय विज्ञान संस्थान से रिटायर हुए और 1949 में बेंगलुरु में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। उन्होंने इसके निदेशक के रूप में कार्य किया। रमन प्रभाव के लिए ही 1954 में उनको सर्वोच्‍च सम्‍मान ‘भारत रत्‍न’ से नवाजा गया था। उनका 82 साल की आयु में 1970 में निधन हुआ था। रमन के सम्मान में उनकी विशेषता वाले डाक टिकट 1971 और 2009 में जारी किए गए थे।