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Suhas L Y : हौसले ने दिया जज्बे को उड़ान, हार से निकाली जीत की रास्ता

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हौसला हो और मन में कुछ कर दिखाने की चाह हो तो आपकी शारीरिक अक्षमता भी आपके आड़े नहीं आ सकती। खेल-कूद को अक्सर फिट शरीर वाले लोगों का क्षेत्र माना जाता है, पर यह बिल्कुल भी सही नहीं है। बहुत से हैंडीकैप्ड लोग भी खेल कूद में खासे इंटरेस्टेड होते हैं और इसमें अपनी भागीदारी भी देते हैं और उनके लिए ही खास आयोजित किया जाता है पैरालंपिक गेम्स। इस वर्ष टोक्यो ओलम्पिक के खत्म होने के बाद अब टोक्यो में शुरू हो गया है पैरालंपिक गेम्स। भारत के खिलाड़ियों की भी इसमें अच्छी भागीदारी है। भारत की ओर से टोक्यो पैरालम्पिक गेम्स में भाग लेने वाले आज एक शख्स की कहानी हम आपके लिए ले कर आये हैं।

हम बात कर रहे हैं यूपी के गौतमबुद्धनगर के डीएम सुहास एल वाई (Suhas L Y) की। जी हां बिल्कुल सही सुना आपने एक IAS ऑफिसर पैरालंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। DM सुहास एल वाइ देश के पहले ऐसे IAS अफसर हैं, जो टोक्यो पैरालंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहे हैं। वह साल 2007 बैच के आईएएस अफसर हैं, साथ ही दुनिया के दूसरे नंबर के पैरा बैडमिंटन प्लेयर भी हैं।

कर्नाटक के छोटे से शहर शिगोमा में जन्मे सुहास एलवाई ने अपनी तकदीर को अपने हाथों से लिखा है। जन्म से ही दिव्यांग, पैर में दिक्कत होने की वजह से, सुहास शुरुआत से IAS नहीं बनना चाहते थे। वो बचपन से ही खेल में बेहद दिलचस्पी रखते थे। इसके लिए उन्हें पिता और परिवार का भरपूर साथ मिला। पैर पूरी तरह फिट नहीं था, ऐसे में समाज के ताने उन्हें सुनने को मिलते, लेकिन पिता और परिवार चट्टान की तरह उन तानों के सामने खड़े रहे और कभी भी सुहास का हौंसला नहीं टूटने दिया।

सुहास के पिता उन्हें सामान्य बच्चों की तरह देखते थे। सुहास का बैंडमिंटन प्रेम, उनके पिता की ही देन है। परिवार ने उन्हें कभी नहीं रोका, जैसी मर्जी हुई सुहास ने उस गेम को खेला और पिता ने भी उनसे हमेशा जीत की उम्मीद की। पिता की नौकरी ट्रांसफर वाली थी, ऐसे में सुहास की पढ़ाई शहर-शहर घूमकर होती रही। सुहास की शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई तो वहीं सूरतकल शहर से उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से कम्प्यूटर साइंस में इंजिनियरिंग पूरी की।

साल 2005 में सुहास टूट गए थे। उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। उनके जीवन में पिता का महत्वपूर्ण स्थान था। सुहास को पिता की कमी खलती रही।
उनका जाना सुहास के लिए बड़ा झटका था। इसी बीच सुहास ने ठान लिया कि अब उन्हें सिविल सर्विस ज्वाइन करनी है। फिर क्या था सब छोड़छाड़ कर उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की। UPSC की परीक्षा पास करने के बाद उनकी पोस्टिंग आगरा में हुई। फिर जौनपुर, सोनभद्र, आजमगढ़, हाथरस, महाराजगंज, प्रयागराज और फिर वो गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी बने।

सुहास अब बड़े अधिकारी बन चुके थे, लेकिन वो इतने पर ही नहीं रुके। जिस खेल को वो पहले शौक के तौर पर खेलते थे अब धीरे-धीरे उनके लिए जरूरत बन गया था। सुहास अपने दफ्तर की थकान को मिटाने के लिए बैंडमिंटन खेलते थे, लेकिन जब कुछ प्रतियोगिताओं में मेडल आने लगे तो फिर उन्होंने इसे प्रोफेशनल तरीके से खेलना शुरू किया। 2016 में उन्होंने इंटरनेशनल मैच खेलना शुरू किया। चाइना में खेले गए बैंडमिंटन टूर्नामेंट में सुहास अपना पहला मैच हार गए, लेकिन इस हार के साथ ही उन्हें जीत का फॉर्मूला भी मिल गया और उसके बाद जीत के साथ ये सफर अभी तक लगातार जारी है। सुहास का कहना है कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी प्रशासनिक सेवा की है। सुहास को काम के बाद रात को जो टाइम मिलता, उसमें वो बैडमिंटन की प्रैक्टिस करते हैं। सुहास हर रोज करीब 3 से 4 घंटे प्रैक्टिस करते हैं।

पैरालंपिक की शुरुआत 24 अगस्त से हो चुकी और ये 5 सितंबर तक चलेगा। भारत के अभियान की शुरुआत 27 अगस्त को हुई है। सुहास 2 सिंतबर को टोक्यो पैरालम्पिक में अपना दम दिखाने उतरेंगे। सुहास एल वाई कहते हैं “मुश्किलों से सीखकर ही यहां तक आया हूं, उम्मीद करता हूं आगे का सफर अच्छा हो। हम हार से जीतने की राह निकालें तो अच्छा होगा, इससे अगली बार के लिए आपको हौसला मिलता है। फिलहाल पैरालंपिक के लिए मैंने पूरी मेहनत की है।” हमें उम्मीद है की इस पैरालम्पिक में सुहास अपनी प्रतिभा दिखाते हुए, भारत का मान बढ़ाएंगे। इस गौरवपूर्ण कार्य में पूरे भारत देश की शुभकामनाएं उनके साथ है।