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जयंती विशेष: Atal Bihari Vajpayee की 97वीं जयंती पर जानें उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

Atal-Bihari
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मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांगा करूंगा
अंतहीन अंधियार ज्योति की,
कब तक और तलाश करूंगा
मैंने जन्म नहीं मांगा था.

अटल बिहारी वाजपेयी. कौन जनता था कि 90 साल पहले आगरा के एक छोटे से गांव बटेश्वर में रहने वाले एक स्कूल मास्टर कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर 25 दिसंबर, 1924 को जन्मा ये बच्चा, एक दिन राजनितिक क्षितिज का ‘अटल’ और ‘अमिट नक्षत्र ‘ बन देश के जन जन का नायक कहलायेगा. मां कृष्णा देवी का लाडला देश का ऐसा नायक बन जाएगा, जिसे लोग जन नायक मानेंगे. लोग उसे अटल बिहार वाजपेयी के नाम से कम, ‘अटल ‘ नाम से ज्यादा जानेंगे. आज अटल जी के जयंती के अवसर पर आइये जानते हैं उनसे जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में…

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) ने अपने बीए की पढ़ाई विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर से की. फिर इन्होने कानपुर के डीएवी कॉलेज से मास्टर की डिग्री ली. उसके बाद इन्होने एलएलबी किया. पर रूचि न होने के कारण, उसे बीच में छोड़ पत्रकारिता में एडमिशन लिया. जिस समय अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ, उस समय पड़ोस के गिरजाघरों से घंटे के स्वर और तोपों की आवाज़ आ रही थी. इसी दिन ईसाई धर्म के भगवान ईसा मसीह का भी जन्म हुआ था और यह घंटे और तोपों की सलामी उनके लिए थी. पर ऐसा लग रहा था कि ये सब अटल जी के जन्म के लिए हो.

1947 में भारत को स्वतंत्रा मिल चुकी थी और लोगों के बिच आज़ादी मिलने को लेकर काफी खुशी थी. देश का जन जन आजादी के हर्ष से झूम उठा था. अटल जी ने देश की आजादी के लिए जेल यात्रा भी की और वह इस बात से खुश थे कि अंग्रेजों के चंगुल से देश को आजाद कराने में उन्होंने भी अपना योगदान दिया.

अटल जी की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1952 में हुई. उन्होंने इस वर्ष हुए आम चुनावों में भाग लिया. उनका चुनाव चिन्ह ‘दीपक’ था. इस चुनाव में उनको कुछ खास सफलता नहीं मिली. 1957 में दूसरे आम चुनाव के समय तक अटल जी की राजनैतिक छवि राष्ट्रीय राजनैतिक पटल पर चमकने लगी थी.

अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) ने उस समय तीन संसदीय क्षेत्रों से अपने चुनाव पर्चे भरे थे. बलरामपुर सीट से वे जीत पाकर लोकसभा में पहुंचे. बलरामपुर के अलावा उन्होंने लखनऊ और मथुरा संसदीय सीट से भी नामांकन पत्र दाखिल किया था. वह लगभग चार दशक तक भारतीय संसद के सदस्य रहे. अटल जी लोकसभा में 10 बार चुनकर गए थे. जबकि दो बार उन्हें राज्यसभा भेजा गया था.

अटल बिहारी बाजपेयी सबसे पहले 16 मई 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने. हालांकि वो ज्यादा दिनों तक इस पद पर नहीं रहे. लगभग दो हफ्ते बाद ही उन्हें 1 जून 1996 को यह कुर्सी छोड़नी पड़ी. क्योंकि उनकी सरकार गिर गई. इस प्रकार वो पहली बार मात्र 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने. इसके बाद अटल जी 19 मार्च 1998 को फिर से इंडिया के प्रधानमंत्री बने. लेकिन इसबार भी वह 5 साल के लिए नहीं बल्कि लगभग 20 महीने के लिए ही पीएम बने और 10 अक्टूबर 1999 को उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हुआ.

अटल बिहारी बाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee)1999 में तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने. इसबार उन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया. 19 मार्च 1999 से 22 मई 2004 तक वो भारत के प्रधानमंत्री रहे. फिर इन्होंने 2005 में राजनीति से संन्यास ले लिया और नई दिल्ली स्थित 6-ए कृष्णामेनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहने लगे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर जिंदगी की शुरुआत करने वाले अटल जी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी कि एनडीए सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे. आज के दौर में पीएम मोदी दूसरे ऐसा नेता हैं, जो एनडीए सरकार के दूसरे प्रधानमंत्री बने. आपको बता दें कि साल 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस सत्ता में थी और डॉ मनमोहन सिंह को देश का पीएम बनाया गया था. अटल जी पहले ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में 5 साल का कार्यकाल पूरा किया.

अटल जी भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे और साल 1968 से 1973 तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. फिर 1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. 3 अप्रैल 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी को सौंपा गया. दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए, लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली थी.

अटल जी अपनों के साथ-साथ विरोधियों के भी पसंदीदा नेता थे. उनकी बोलने की शैली, बातों को रखने का तरिका, ये सब अन्य नेता अटल जी से सीखते थे. अटल जी से जुड़ी एक ऐसी कहानी है, जिसकी चर्चा अक्सर होती है. दरअसल अटल जी जब देश के पीएम थे, तो उन्होंने 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की थी. इस सेवा का उद्घाटन करते हुए प्रथम यात्री के रूप में वाजपेयी जी ने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज़ शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नयी शुरुआत की पहल की. कुछ ही समय बाद पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना और उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया.

अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतरराष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया. इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का बहुत नुकसान हुआ और पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एकबार पुनः शून्य हो गए.

वाजपेयी ने ‘गर्व से कहो हम हिन्दू’ की जगह ‘गर्व से कहो हम भारतीय हैं’ का साहस दिखया. आपको बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी के 87वां जन्म दिवस पर उनकी पार्टी ने भारत रत्न देने की मांग की थी. पर 2013 में दो भारत रत्न की घोषणा की गयी. जिसमे एक नाम क्रिकेट जगत के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर और दूसरे थे भारत के वैज्ञानिक रसायनशास्त्री सी.ए.राव.

25 दिसंबर 2014 को जब देश अटल बिहारी वाजपेयी का 90वां जन्मदिन मनाने की खुशी में डूबा हुआ था. तब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महामना मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न देने की जानकारी दी. फिर आगले साल 2015 में भारत रत्न से वाजपेयी को अलंकृत किया गया.

साल 2009 में अटल जी को एक दौरा पड़ा था. जिसके बाद वह बोलने में असक्षम हो गए थे. उन्हें 11 जून 2018 को किडनी में संक्रमण और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि कि एम्स (AIIMS) में भर्ती कराया गया था. जहाँ 16 अगस्त 2018 को उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली. ये वो दिन था जब राजनीति के ‘अटल’ जिंदगी की जंग हार गए और लोगों ने कहा मृत्यु ने अटल को नहीं, बल्कि अटल जी ने मृत्य को गले लगाया. अटल जी की याद में राजधानी दिल्ली स्थित राजघाट के पास शान्ति वन में एक स्मृति स्थल बनाया गया है.

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