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बाबरी विध्वंस की पूरी कहानी, देखिये इस VIDEO में

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DESK: 6 दिसंबर 2021. आज बाबरी मस्जिद विध्वंस की 29वीं बरसी है । आज ही के दिन, ठीक 29 साल पहले विध्वंस हुआ था बाबरी मस्जिद का। जिससे जन्म लिया सांप्रदायिक दंगों ने. दंगे जो जन्म देते हैं ऐसे विनाश को जो ये नहीं देख पाता कि दोषी कौन है और सजा किसे दी जा रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस भारत के इतिहास में सबसे विवादित मसलों में से एक है। बाबरी मस्जिद विध्वंस क्यों हुआ, इसका इतिहास क्या था, इस मस्जिद को ले कर पेश किए गए तमाम दावे, इन सभी के बारे में हम जानेंगे इस पोस्ट में.. शुरुआत करते हैं बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि से जुड़े लगभग 500 साल पुराने इतिहास से..

Babari Masjid video

मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 1528 में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने अयोध्या में विवादित स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण कराया था। इसे लेकर हिंदू समुदाय के लोगों ने दावा किया कि वह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां एक प्राचीन मंदिर हुआ करता था। हिंदू पक्षकारों के अनुसार, मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे ही भगवान राम की जन्मस्थली थी। मीर बाकी के बनाए हुए इस मस्जिद में तीन गुंबदें थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि साल 1853 में अयोध्या में रामजन्मभूमि को लेकर विवादित स्थल के आसपास पहली बार सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों के कुछ साल बाद 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित स्थल के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई।

रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद को लेकर असली विवाद 23 दिसंबर 1949 को तब शुरू हुआ, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों का आरोप था कि किसी ने रात में विवादित स्थल पर चुपचाप मूर्तियां रख दीं। इस विवाद के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया।

साल 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई। इसमें एक में रामलला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने देने की इजाजत मांगी गई। इसके बाद वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की। वहीं, वर्ष 1961 में उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अदालत में अर्जी दाखिल कर विवादित जगह पर कब्जा दिलाने और वहां से मूर्तियां हटाने की मांग की।

इसके बाद साल 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए एक समिति का गठन किया और इसके दो साल बाद वर्ष 1986 में यूसी पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज केएम पांडेय ने 1 फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत देते हुए ढांचे पर से ताला हटाने का आदेश दिया।

फिर आया 6 दिसंबर 1992 का दिन। वो दिन जब धुएं के गुब्बार में किसी का विध्वंस था तो किसी के न्याय की परिभाषा। उस रोज क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ ये ब्यौरा न्यायालय के निर्णय में दर्ज है.. पर 6 दिसंबर 1992 के ठीक 29 साल बाद आइए हम आपको सुनते हैं उस दिन की कहानी..

उत्तर प्रदेश के अयोध्या की वो पौने 3 एकड़ की जमीन.. जिसे ले कर विवाद था। हिन्दुओं का कहना था कि वो उनके रामलला की जन्मभूमि है तो वहीं मुसलमानों का दावा था कि उस स्थान पर हमेशा से मस्जिद ही रहा था।

राजनीति के उन्माद ने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में सिर्फ विवादित ढांचा ही नहीं ढाया था बल्कि कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी राजनीति की दीवार भी गिरा दी थी। उस ढांचे के मलबे की बुनियाद पर एक नई तरह की राजनीति का उदय हुआ था।

अयोध्या की 6 दिसंबर 1992 की सुबह अलग थी। लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या के उस विवादित ढांचे के पास इकठ्ठा हो रहे थे। हालांकि कारसेवक 5 दिसंबर 1992 की सुबह से ही अयोध्या में विवादित ढांचे के पास पहुंचने शुरू हो गए थे। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ढांचे के सामने सिर्फ भजन-कीर्तन करने की इजाजत दी थी। लेकिन 6 दिसंबर की सुबह का मंजर कुछ और था। हवाओं में भजन कीर्तन की जगह किसी और ही होनी की आशंका तैर रही थी। लगभग ढाई लाख राम मंदिर समर्थक जब अयोध्या में घुसे तो मानो इंसानों का रेला गलियों में सैलाब बन कर बह निकला.. हर कदम तेजी से विवादित स्थल की ओर बढ़ रहा था। ना कानून न प्रशासन , पूरी अयोध्या कारसेवकों के जुनून के हवाले थी। कई लोगों के हाथों में धारदार हथियार थे मगर उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था।

दोपहर होते होते विवादित स्थल पर अनियंत्रित भीड़ आक्रामक होने लगी और शाम तक बाबरी मस्जिद ढाही जा चुकी थी। 6 दिसंबर 1992 का वो 360 मिनट और बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिट गया था। कहते हैं कि शाम पांच बजे तक बाबरी मस्जिद जमींदोज़ हो गयी थी। अगली सुबह उस मलबे के ऊपर किसी ने राम नाम का झंडा फहरा दिया था। हिंदुओं का कहना था कि उनके रामलला की जन्मभूमि उन्हें वापस मिल गयी है।

पर यह अंत नहीं आरम्भ था। बाबरी मस्जिद के विध्वंस का reaction भारत ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों में भी तुरंत देखने को मिला। बांग्लादेश और पाकिस्तान में बहुत से हिन्दू मंदिर ढाहे गए। भारत में जगह जगह साम्प्रदायिक दंगे भड़के। सैकड़ों निर्दोष इन दंगों में बेमौत मारे गए।

देशभर में भड़के सांप्रदायिक दंगों में 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। मामले की FIR दर्ज हुई और 49 लोग आरोपी बनाए गए। आरोपियों में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, चंपत राय, कमलेश त्रिपाठी जैसे भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के नेता शामिल थे।

अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के 6 साल बाद वर्ष 2002 में हिंदू कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही ट्रेन में गोधरा में आग लगा दी गई, जिसमें 58 लोगों की मौत हो गई। इसकी वजह से गुजरात में हुए दंगे में 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। इसके 8 साल बाद वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट की अपील की। भाजपा दिग्गज नेताओं पर आपराधिक साजिश के आरोप फिर से बहाल किए गए। 8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने का निर्देश दिया गया और 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बेंच ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

वहीं साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने का मामला 28 साल तक कोर्ट में चलता रहा और पिछले साल 30 सितंबर को लखनऊ की CBI कोर्ट ने सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। फैसले के वक्त तक 49 में से 32 आरोपी ही बचे थे, बाकी 17 आरोपियों का निधन हो चुका था।

आपको बता दें, 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर फैसला दिया था। इस फैसले के तहत जमीन का मालिकाना हक राम जन्मभूमि मंदिर के पक्ष में गया। मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन अलग से देने का आदेश दिया गया। पिछले साल 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन किया और राममंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हो गया।

वैसे तो बाबरी मस्जिद के विध्वंस को पूरे 29 साल हो गए हैं , लेकिन उसका भूत अभी भी जीवित है। और उसे जीवित रखने का पूरा श्रेय जाता है हमारे देश के महान राजनीतिज्ञों को। 6 दिसंबर 1992 भारत के इतिहास में ऐसा दिन है, जिसने इस देश की राजनीति को एक ऐसा मोड़ दिया कि 29 सालों में हम बहुत पीछे जा चुके हैं। आज हमें ऐसे मुद्दे प्रभावित करते हैं जिसे समाज ने भारत के विभाजन के बाद बहुत पीछे छोड़ दिया था। धर्म-निरपेक्षता सिर्फ हमारे संविधान में नहीं, बल्कि हमारे रग़-रग़ में बसी हुई थी. पर आज इस बात में कितनी सच्चाई है ये आप भी जानते हैं!

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