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Ram Prasad Bismil : अपनी लिखी किताबों से खरीदा था पहला हथियार

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भारत में आजादी के लिए कई वीर पुरुषों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। तो कईयों ने अपना पूरा जीवन कारावास में बिता दिया। इन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने से पहले अपने देशवासियों और देश के आने वाले भविष्य के लिए सोचा। और कई बार अपनी सोच से अंग्रेजी हुकूमत को हिला रखा। इसी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक नाम है पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Pandit Ram Prasad Bismil)। आज यानी 11 जून को हर साल देशभर में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की जयंती मनाई जाती है। भारत की आजादी में जितना भगत सिंह, सुखदेव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान रहा है उतना ही योगदान राम प्रसाद बिस्मिल का भी रहा है। भारत की आजादी में इन्होंने अपना काफी योगदान देते हुए क्रांतिकारियों के बीच अहम भूमिका निभाते रहे। क्रांतिकारियों के बीच राम प्रसाद बिस्मिल का चेहरा प्रमुख था। वह स्वतंत्रा सेनानी होने के अलावा एक अव्वल दर्जे के लेखक, साहित्यकार, इतिहासकार और बहुभाषी अनुवादक थे। राम प्रसाद बिस्मिल में इन सब चीजों की कुशलता होने के बावजूद भी वह हर वक्त देश के युवाओं को देश की स्वतंत्रता के प्रति जागरूक करते थे और वह इसमें सफल भी होते रहते थे।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) की 124वीं जयंती पर उनके जीवन के कुछ पहलुओं को जानते हैं:

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर शहर मे 11 जून 1897 को जन्मे रामप्रसाद अपने पिता मुरलीधर और माता मूलमती की दूसरी सन्तान थे।

पहले बच्चे के मर जाने के बाद राम प्रसाद के माता पिता ने पंडित से उनके कुंडली दिखाते हुए उनका नामकरण करवाया और उनका नाम रामप्रसाद रखा गया। घर में राम प्रसाद बिस्मिल को लोग प्यार से राम कहकर पुकारते थे। और उनकी माता हमेशा कहती रहती थी कि मुझे राम जैसा ही बेटा चाहिए था।

रामप्रसाद कुल 9 भाई बहन थे जिनमें से पांच बहने और वो चार भाई थे। इनमें से आगे चलकर दो बहने और दो भाई का निधन हो गया। बचपन से ही रामप्रसाद की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा था।

किशोरावस्था में रामप्रसाद को अपने पिता के संदूक से पैसे चुराने की लत लगी। और चुराए हुए पैसों से वे उपन्यास खरीद कर पढ़ना शुरू किया साथ ही सिगरेट और भांग की भी लत लग गई।

उर्दू मिडिल की परीक्षा में पास होने के बाद उन्हें अंग्रेजी पढ़ना शुरु किया था।

30 साल के जीवनकाल में उनकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थी। जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं थी।

सारी की सारी पुस्तकें अंग्रेजों द्वारा जब्त कर ली गयीं। इस लिहाज से वह भारत के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे, जिसने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे।

लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल कुछ क्रांतिकारी विचारों वाले युवकों के सम्पर्क में आए। और यहीं से उन्होंने अपना मकसद निर्धारित कर लिया।

काकोरी कांड जब क्रांतिकारियों को यह लगने लगा कि अंग्रेजों से विनम्रता से बात करना या किसी भी प्रकार का आग्रह करना फिजूल है तो रामप्रसाद कुछ क्रांतिकारियों के साथ मिलकर विस्फोटकों और गोलीबारी का प्रयोग करने की योजना बनाने लगे थे।

इस समय जो क्रांतिकारी विचारधारा विकसित हुई वह पुराने स्वतंत्रता सेनानियों और गांधी जी की विचारधारा से बिलकुल उलट थी।

रामप्रसाद ने सहारनपुर-लखनऊ 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले धन को लूटने की योजना बनाई थी। और 9 अगस्त, 1925 को उनके नेतृत्व में अशफ़ाक उल्ला खां समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने ट्रेन को लूटा।

जब अंग्रेजों को देश में हो रहे क्रांतिकारी गतिविधियों से डर लगने लगा तो वह आए दिन हर एक क्रांतिकारियों को धरपकड़ करने लगे। इसी बीच राम प्रसाद बिस्मिल अपने कुछ क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजी सेना द्वारा पकड़े गए।

अंग्रेजों ने ऐतिहासिक काकोरी कांड में मुकदमे के नाटक के बाद 19 दिसंबर, 1927 को उन्हें गोरखपुर की जेल में फांसी पर चढ़ा दिया था।

राम प्रसाद बिस्मिल हंसते हंसते फांसी पर चढ़े थे और फांसी पर चढ़ने से पहले उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा में यह मांग की थी कि ‘वह अंग्रेजी हुकूमत का नाश चाहते हैं।‘