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“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”- रानी लक्ष्मीबाई

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सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’। जब भी महिलाओं की वीरता का गाथा गाया जाता है, तो हम जो नाम सबसे पहले लेते हैं वह नाम है रानी लक्ष्मीबाई। इतिहास के पन्नों में महिलाओं की वीरता की प्रेरणा रही रानी लक्ष्मीबाई का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। अक्सर लोग महिलाओं को प्रेरित करने के लिए कहते हैं कि “हर महिला के अंदर एक रानी लक्ष्मीबाई छिपी होती है।“ इस कथन के पीछे जिस महिला का जिक्र किया जाता है वह महिला पूरे महिला वर्ग के लिए एक प्रेरणा की स्रोत है। जिसने अपने परिवार और अपने राज्य के लिए अंग्रेजों को धूल चटा दिया था। और जिसने अपने आत्मसम्मान के लिए कभी झुकना नहीं सीखा था। इनकी वीरता की गाथा इतनी बड़ी है की इन्हें कुछ पन्नों में नहीं समेटा जा सकता।

तो आइए जानते हैं दुनिया भर की महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनी लक्ष्मी बाई के 163वें पुण्य तिथि पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ गाथाओं को:

काशी के पुण्य तथा पवित्र क्षेत्र अस्सीघाट, वाराणसी में 19 नवंबर, 1828 को जन्म हुआ था रानी लक्ष्मीबाई का।

लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम ‘मणिकर्णिका’ रखा गया। लेकिन इन्हें लोग प्यार से ‘मनु’ कह कर पुकारते थे। ‌

छोटी उम्र में ही लक्ष्मीबाई की मां का निधन हो गया था। इनके पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। मां के निधन के बाद मनु पिता के साथ बिठूर आ गई थीं।

यहीं पर मनु ने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याओं को सीखा था।

पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। और उन्हीं बच्चों के साथ मनु भी पढ़ने लगी। सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी, साथ ही तलवार चलाना, धनुर्विद्या में निष्णात हुई।

सन् 1842 में लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ, जहां वे झाँसी की रानी बनीं।

विवाह के बाद मनु का नाम मणिकर्णिका से बदलकर लक्ष्मीबाई रखा गया।

सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। परन्तु चार महीने की उम्र में ही बच्चे का निधन हो गया।

जब 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य अधिक खराब रहने लगा तो उन्हें दत्तक पुत्र (Adopted Son) लेने की सलाह दी गयी, इसका नाम दामोदर रखा गया। 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया।

निधन के वक्त रानी लक्ष्मीबाई केवल 25 वर्ष के थे जिसके बाद वह झांसी की रानी बन गई। रानी बनने के बाद वह अपने बेटे दामोदर राव को झांसी के शासक के रूप में देखना चाहती थीं।

गंगाधर राव के गुजरने के बाद अंग्रेजों को झांसी पर कब्जा करने का एक आसान तरीका मिला। और अंग्रेजों ने मार्च 1854 में रानी लक्ष्मीबाई को ₹60,000 की वार्षिक पेंशन दी और किला छोड़ने का आदेश दिया।

ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल, लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स सिद्धांत (हड़पने की नीति) को लागू किया, इस नीति के मुताबिक दामोदर राव के पास झांसी के सिंहासन पर कोई अधिकार नहीं था, क्योंकि वह दिवंगत गंगाधर राव के एक दत्तक पुत्र थे।

ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने 14000 सिपाहियों की सेना को इकट्ठा किया था।

जिसमें तांत्या टोपे, नाना राव पेशवा, गुलाम गौस खान, दोस्त खान, खुदा बख्श, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह जैसे कई योद्धा शामिल थे।

पुरुष योद्धाओं के अतिरिक्त महिला योद्धाओं में जलकारी बाई, सुंदर- मुंदर, महिलाएं शामिल थीं।

रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो के खिलाफ 1857 में विद्रोह शुरू किया और कहा कि “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”।

जिसके बाद बड़ी बहादुरी से अपने बेटे को पीठ पर बांधकर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी।

अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई काफी चोटिल हो गई थी। और वह चाहती थी कि अंग्रेजी सैनिक उनके शरीर को ना खोजें, इसीलिए लक्ष्मी बाई की सेना उन्हें गंगादास मठ में ले गई।

गंगादास मठ में ले जाने के बाद 18 जून 1858 को रानी लक्ष्मी बाई का निधन हो गया।

लक्ष्मी बाई के निधन के बाद, एक वरिष्ठ ब्रिटिश सेना अधिकारी ह्यूग रोज ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रभावशाली चरित्र, सुंदर और एक कर्मठ नेता के रूप में वर्णित किया था।

आपको बता दें मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित उनके निधन स्थल को ‘रानी लक्ष्मीबाई समाधि स्थल’ के नाम से बना दिया गया है।