महत्वपूर्ण-दिवस-सप्ताह-वर्ष

Sukhdev Thapar Jayanti : बचपन से ही आज़दी की आग जलाकर चले थे, मात्र 24 साल की उम्र में हुए देश के लिए कुर्बान

one
Spread It

सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को जब अंग्रेजों ने अपना गुलाम बनाया था तब कई क्रांतिकारियों ने अपने लहू से आजादी के नारे लिखे थे। जब जब हम अपने देश की आजादी को याद करते हैं तो ऐसे कई क्रांतिकारी हैं जिन्हें हम कभी भी अपने इतिहास तो दूर दिल से भी नहीं निकाल सकते। देश में आजादी के लिए हर देशवासियों के दिलों में आजादी की मसान मसाल जलाने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह( Bhagat Singh), राजगुरु(Rajguru), सुखदेव (Sukhdev) इन्हें कभी भुलाया ही नहीं जा सकता। इन्हीं में से एक क्रांतिकारी का आज यानी 15 मई को उनका 114वां जन्म दिन है, जिनका नाम है सुखदेव थापर (Sukhdev Thapar) । इनका जन्म 15 मई, 1907 को लुधियाना के लायलपुर में हुआ था।

आज की पीढ़ी जब भगत सिंह की मूर्ति को और दो लोगों की मूर्तियों से घिरा हुआ देखते हैं तो वह समझ जाते हैं एक राजगुरु है तो दूसरे सुखदेव थापर। लेकिन उन दोनों के बारे में अगर आज की पीढ़ी से पूछा जाए तो बहुत कम ही लोग हैं जो उनके बारे में बता पाए।

तो आइए आज सुखदेव थापर के बर्थ एनिवर्सरी पर उनके जीवन के कुछ पन्नों को पलटते हैं:

सुखदेव के पिता रामलाल थापर (Ramlal Thapar) था, जो अपने व्यवसाय के कारण लायलपुर में रहते थे। इनकी माता रल्ला देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।

सुखदेव जब 3 साल के थे, तभी इनके पिताजी का निधन हो गया था। उनका लालन-पालन पिता के बड़े भाई लाला अचिन्त राम ने किया था।

वे समाज सेवा के साथ-साथ देशभक्तिपूर्ण कार्यों में हमेशा आगे रहते थे।

इसका प्रभाव ही सुखदेव पर पड़ा। और बचपन से ही उनमें कुछ कर गुजरने की चाह थी।

सुखदेव ने युवाओं में ना सिर्फ देशभक्ति का जज्बा भरने का काम किया था। बल्कि खुद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया करते थे।

1919 में जलियांवाला बाग के भीषण नरसंहार के समय सुखदेव 12 वर्ष के थे। इस घटना से देशभर में लोगों के अंदर ज्वाला फूटने लगी थी और फिर जब पंजाब में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज के बाद उनका गया। तो इन घटनाओं ने सुखदेव और भगत सिंह को बदला लेने के लिए प्रेरित किया।

यही वो वजह थी, जिसने भगत सिंह को अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम फेंकने की उस ऐतिहासिक घटना के लिए प्रेरित भी किया था।

23 मार्च, 1931 को सुखदेव, राजगुरू, और भगतसिंह के साथ लाहौर षड़यंत्र में आरोपी बनाकर फांसी दे दी गई थी।

मात्र 24 साल की उम्र में ही सुखदेव अपने दोस्त भगतसिंह के साथ देश के लिए कुर्बान हो गए। जबकि सेंट्रल असेम्बली बम केस में बटुकेश्वर दत्त को उम्र कैद की सजा दी गई थी।

तीनों को एक ही दिन फांसी हुई। इसलिए इन तीनों का मेमोरियल भी एक ही जगह बनाया गया यानी पंजाब के फीरोजपुर में हुसैनीवालां गांव, जहां तीनों का अंतिम संस्कार सतलज नदी के किनारे किया गया था।

जिस उम्र में आज की पीढ़ी यह भी ढंग से नहीं सोच पाती कि उन्हें आगे चलकर जीवन में क्या करना है। उम्र में सुखदेव राजगुरु भगत सिंह और ना जाने क्यों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। हम इन वीर पुरुषों को नमन करते हैं जिनकी वजह से आज हम अपने देश में खुलकर सांस लेते हैं और अपने अनुसार जीवन जी पा रहे हैं।

Indian Railways : यात्रीगण ध्यान दें, रेलवे ने 31 मई तक कैंसिल की कई ट्रेनें; देखें लिस्ट