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Rasbihari Bose : असफलताओं को सफलता की सीढ़ी समझने वाले एक क्रन्तिकारी

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रासबिहारी बोस (Rasbihari Bose), एक भारतीय क्रान्तिकारी। जिन्होने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ‘गदर’ और ‘आजाद हिन्द फौज’ के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने देश के अन्दर ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी रहकर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया। ताउम्र भारत को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयास करने वाले रासबिहारी बोस की आज यानी 25 मई को बर्थ एनिवर्सरी (Birth anniversary) मनाया जाता है।

रासबिहारी बोस के जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें :

रासबिहारी बोस का जन्म 26 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नाम के गाँव में हुआ था।

इनकी प्रारंभिक शिक्षा चन्दननगर में हुई, जहाँ उनके पिता विनोद बिहारी बोस (Vinod Bihari Bose) कार्यरत थे।

 वे जब मात्र तीन साल के थे तब उनकी मां का निधन हो गया जिसके बाद उनकी मामी ने उनका पालन पोषण किया। 

चन्दननगर के डुप्लेक्स कॉलेज से उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा ग्रहण की थी। उन्हें अपने शिक्षक चारू चांद से क्रांति की प्रेरणा मिली थी।

उन्होंने बाद में चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई फ्रांस और जर्मनी से की। 

रासबिहारी ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में कार्य किया था।

सन 1905 के बंगाल विभाजन के समय रासबिहारी बोस क्रांतिकारी गतिविधियों से पहली बार जुड़े। इस दौरान उन्होंने अरविंदो घोस और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकुमत की मनसा को उजागर करने का प्रयत्न किया था। निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर उनका परिचय संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों से हुआ।

दिसंबर 1911 में ‘दिल्ली दरबार’ के बाद जब भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली के चांदनी चौक में निकाली जा रही थी तब हार्डिंग पर बम फेंका गया परन्तु वो बाल-बाल बच गए। बम फेंकने की इस योजना में रासबिहारी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 

सन 1913 में बंगाल बाढ़ राहत कार्य के दौरान उनकी मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुई, जिन्होंने उनमें नया जोश भर दिया जिसके बाद रासबिहारी बोस दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। 

उन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिये प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ‘गदर’ की योजना बनायी और फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रान्तिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

उनके क्रांतिकारी कार्यों का एक प्रमुख केंद्र वाराणसी रहा, जहाँ से उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया।प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान युगांतर के कई नेताओं ने ‘सशस्त्र क्रांति’ की योजना बनाई, जिसमें रासबिहारी बोस की प्रमुख भूमिका थी।

जापान में उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। वहाँ पर उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। उन्होंने जापानी भाषा सीखी और उसी भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘रामायण’ का भी अनुवाद जापानी भाषा में किया था।

उन्होंने मार्च 1942 में टोक्यो में ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और भारत की स्वाधीनता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया।

21 जनवरी 1945 को रासबिहारी बोस का निधन हो गया। जापानी सरकार ने उन्हें ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से अलंकृत किया था।

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