महत्वपूर्ण-दिवस-सप्ताह-वर्ष रचनाएं साहित्य

Raja Ram Mohan Roy Birth Anniversary: आधुनिक भारत की नींव रखने वाले समाज सुधारक

raja-ram-mohan-roy
Spread It

भारत एक ऐसा देश है जहाँ स्त्री को देवी का रूप माना जाता है।

बीते कुछ दशकों में, समय में परिवर्तन आया और स्त्रियों के साथ बहुत ही दुर्व्यवहार किया जाने लगा।

देश को आधुनिक बनाने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकारों की भी बात करने के लिए Raja Ram Mohan Roy को सदैव याद किया जाता है।

आज यानी की 22 मई को राजा राम मोहन रॉय की 249वीं जयंती है।

राजा राम मोहन रॉय को मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने ‘राजा’ की उपाधि दी थी।

उन्हें आधुनिक भारत की नींव रखने वाले समाज सुधारक के रूप में भी जाना जाता है।

इनका जन्म 22 मई 1772 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के राधानगर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

इनके पिता का नाम Ramkanta तथा माता का नाम Tarini Devi था।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में हासिल की थी। उनके पिता ने राजा राममोहन को बेहतर शिक्षा देने के लिए पटना भेजा।

15 वर्ष की आयु तक उन्हें बंगाली, संस्कृत, अरबी तथा फ़ारसी का ज्ञान हो गया था।

राजा राम मोहन मूर्तिपूजा और रूढ़िवादी हिन्दू परंपराओं के विरुद्ध थे, यही नहीं बल्कि वह सभी प्रकार की सामाजिक धर्मांधता और अंधविश्वास के खिलाफ थे।

उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘तुहपत अल-मुवाहिद्दीन’ लिखा जिसमें उन्होंने धर्म की वकालत की और उसके रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का विरोध किया।

राय ने उपनिषदों का अनुवाद करने और उस पर चर्चा करने के लिए आत्मीय सभा (Friendship Association) का गठन किया।

राजा राम मोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है।

मुगल सम्राट के राजदूत के रूप में, रॉय भारत में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ पैरवी करने के लिए इंग्लैंड गए। उन्होंने “सती प्रथा” का विरोध किया, जिसमें एक विधवा को अपने पति की चिता के साथ जल जाने के लिए मजबूर करता था।

सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने के बाद, रॉय ने बाल विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा और बहुविवाह के खिलाफ भी अभियान चलाया। वह अंतर्जातीय विवाह, महिला शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में थे।

1828 में, राजा राम मोहन रॉय ने “Brahmo Samaj” की स्थापना की, जिसे भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों में से एक माना जाता है।

उन्होंने पश्चिमी संस्कृति को अपने देश की परंपराओं की सर्वोत्तम विशेषताओं के साथ एकीकृत करने की मांग की। उन्होंने संस्कृत आधारित शिक्षा को अंग्रेजी आधारित शिक्षा के साथ बदलकर भारत में शिक्षा की एक आधुनिक प्रणाली को लोकप्रिय बनाने के लिए कई स्कूलों की स्थापना की।

उन्होंने पहला बंगाली भाषा का साप्ताहिक समाचार पत्र भी लॉन्च किया, जो भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र था।

रॉय ने 1822 में फ़ारसी में Mirat-ul-Akbar पत्रिका प्रकाशित की और समाचार पत्र Sambad Koumudi की स्थापना की, जिसने ब्रिटिश भारत में अपने दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों के बारे में राय बनाने में लोगों की मदद की।

उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया।

उन्होने 1809-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भी काम किया।

उन्हें कई इतिहासकारों द्वारा “Father of the Bengal Renaissance” यानी की “बंगाल पुनर्जागरण का जनक” माना जाता है।

27 सितंबर 1833 को मेनिन्जाइटिस के कारण Stapleton में उनका निधन हो गया और उन्हें Southern Bristol में Arnos Vale कब्रिस्तान में दफनाया गया।

हाल ही में ब्रिटिश सरकार ने रॉय की याद में Bristol में एक सड़क का नाम ‘Raja Rammohan Way’ रखा।

मदद के लिए Sonu Sood का एक और कदम, इन जगहों पे लगाएंगे ऑक्सीजन प्लांट

Featured