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Rabindranath Tagore Jayanti : वो युगपुरुष जिन्होंने सेवा में पाया आनंद

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साहित्य जगत के साथ ही देश की आजादी के आंदोलन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की आज 160वां जन्मदिवस है।

रवींद्रनाथ टैगोर जयंती या रवींद्र जयंती दुनिया में सबसे प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक की जयंती को चिह्नित करने के लिए एक सांस्कृतिक उत्सव है।

वे एक विश्वविख्यात लेखक के साथ ही संगीतकार, नाटककार, गीतकार, चित्रकार और कवि के तौर पर इतिहास में युगपुरुष के रूप में जाने जाते हैं।

रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर (Devendra nath tagore) और माता शारदा देवी (Sharda Devi) थीं।

उन्हें गुरुदेव, कविगुरु और विश्व कवि के नाम से भी जाना जाता है।

इनके पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने 1863 ई में अपनी साधना हेतु कलकत्ते के निकट बोलपुर नामक ग्राम में एक आश्रम की स्थापना की जिसका नाम `शांति-निकेतन’ रखा गया।

टैगोर के पिता ने कई पेशेवर ध्रुपद संगीतकारों को घर में रहने और बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत पढ़ाने के लिए आमंत्रित करते थे।

उन्होंने पहली कविता आठ वर्ष की आयु में लिखी थी और सन् 1877 में केवल सोलह वर्ष की आयु में उनकी प्रथम लघुकथा प्रकाशित हुई थी।

उनकी आरम्भिक शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की इच्छा में 1878 में इंग्लैंड के Brighton के पब्लिक स्कूल में नाम लिखाया फिर लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया किन्तु बिना डिग्री प्राप्त किए ही स्वदेश पुनः लौट आए।

सन् 1883 में मृणालिनी देवी (Mrinalini Devi) के साथ उनका विवाह हुआ।

रबीन्द्रनाथ जी को साल 1913 में उनकी कृति गीतांजली के लिए साहित्य श्रेणी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। वह भारत के साथ ही एशिया महाद्वीप में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले गैर यूरोपीय व्यक्ति हैं।

वह टैगोर हीं थे जिन्होंने 1915 में गांधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले William Rothenstein ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अंग्रेजी कवि Yeats से संपर्क किया और पश्चिमी जगत् के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया।

स्वामी विवेकानंद के बाद वह दूसरे व्यक्ति थे जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार संबोधित किया।

टैगोर ने 19 वीं शताब्दी के अंत में और 20 वीं शताब्दी के आरंभ में पांच दशकों में पांच महाद्वीपों के 30 से अधिक देशों की यात्रा की। जितना अधिक उन्होंने यात्रा की, उतना ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीयता की अवधारणा से प्यार हो गया।

उनको ब्रिटिश सरकार ने ‘सर’ की उपाधि से भी नवाजा था जिसे उन्होंने 1919 में हुए जलियांवाला बाग कांड के बाद लौटा दिया था।

विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना 1921 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल के शान्तिनिकेतन नगर में की। यह भारत के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है।

वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला।’

2011 में, भारत सरकार ने उनके जन्म के 150 वें वर्ष को चिह्नित करने और सम्मानित करने के लिए पांच रुपये के सिक्के जारी किए थे।

टैगोर ने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएँ, यात्रावृन्त, नाटक और सहस्रो गाने भी लिखे हैं। वे अधिकतम अपनी पद्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

टैगोर ने लगभग 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है।

उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं में से गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, चोखेरबाली आदि शामिल है।

प्रोस्टेट कैंसर के कारण 7 अगस्त, 1941 को उनका निधन हुआ था।

उनका एक प्रेरक कथन है “मैंने स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है। मैं जागा और पाया कि जीवन सेवा है। मैंने सेवा की और पाया कि सेवा में ही आनंद है।”

उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी, उनका काम दुनिया भर के युवा कलाकारों की अनगिनत पीढ़ियों को प्रेरित करता है।

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