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रेणु : कहानी जो लिखते लोग कल्पना करने लगते

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बिहार के हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक जिन्होंने देश भर में साहित्य में बिहार की छवि को बदला और पद्मश्री से सम्मानित फणीश्वर नाथ रेणु का आज ही के दिन जन्म ले कर साहित्य के जाने माने लेखक बने है। फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले के फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना गाँव में हुआ था, जो उस समय पूर्णिया जिले में था।

➤ फणीश्वर नाथ रेणु की लेखन शैली ऐसी थी जो लोग पढ़ कर कल्पना करने लगते थे।

➤ इनकी पहली रचना 1954 में “मैला आंचल” को देश भर में बहुत सराहा गया था।

➤ इन्होने मैट्रिक तक की पढाई बिहार और नेपाल में रह कर की थी।

काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी इंटर की परीक्षा 1942 में पूरी की थी। और इसी के बाद उन्होंने ने देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था।

➤ इन्होने जयप्रकश नारायण के साथ सम्पूर्ण क्रांति अपनी अहम भूमिका निभाई

➤ साल 1952-1953 के बीच फणीश्वर नाथ की तबियत काफी ख़राब रहने लगी और इसी बीच उनका झुकाव लेखन की ओर हुआ। उनकी कहानी “तबे एकला चलो रे” में उनकी इस कला की झलक दिखती है।

➤ क्षेत्रीय कहानियों की नींव फणीश्वर नाथ जी द्वारा ही की गयी थी।

➤ फणीश्वर नाथ रेणु को पूर्व राष्ट्रपति वराहगिरी वेंकटगिरी ने 21 अप्रैल 1970 को पद्मश्री से सम्मानित किया था।

➤ पद्मश्री सम्मान से सम्मानित होने के बाद उन्होंने पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रदर्शन के दौरान जब पुलिस ने निहत्थे लोगों पर लाठियां बरसायीं तो उन्होंने आपातकाल के विरोध में न केवल बिहार सरकार की ओर से मिलने वाली 300 रूपये की पेंशन को लौटा दिया, बल्कि पद्मश्री अवार्ड को वापस करते हुए उससे पापश्री अवार्ड कह कर उसे लौटा दिया

➤ फणीश्वर नाथ रेणु के प्रसिद्ध कहानियों में “मारे गये गुलफाम”, “एक आदिम रात्रि की महक”, “लाल पान की बेगम”, “पंचलाइट”, “तबे एकला चलो रे” आदि हैं।

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