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Birsa Munda : एक आदिवासी जिसने अंग्रेजी सेनाओं की रातों की नींद उड़ा रखी थी

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भारत में अंग्रेजी शासन के साथ-साथ आदिवासियों का संघर्ष अट्ठारहवीं शताब्दी से चला आ रहा था। सन् 1766 के पहाड़िया-विद्रोह से लेकर 1857 के ग़दर के बाद भी आदिवासी समाज संघर्ष करते रहे। और उसके बाद सन् 1895 से 1900 के बीच बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला। बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ने हमेशा आदिवासियों के लिए अपनी आवाज बुलंद की। आदिवासियों को लगातार उनके जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जा रहा था और यह सब बिरसा मुंडा के सोच के खिलाफ था। आज से ठीक 121 साल पहले बिरसा मुंडा ने अपनी आखिरी सांस ली थी।

आइए जानते हैं आखिर कौन थे बिरसा मुंडा जिन्होंने अंग्रेजी सिपाहियों के रातों की नींद उड़ा रखी थी:

बिरसा मुंडा (Birsa Munda) का जन्म 15 नवम्बर 1875 के दशक मे एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। जो जनजातीय समूह से थे और छोटा नागपुर पठार (झारखण्ड) निवासी थे।

साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा के एक विधालय में पढ़ाई की। यह शुरू से ही समाज सेवा में रहे। और ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचते रहते थे।

1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में इन्होंने सभी मुंडाओं को इकट्ठा कर अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया।

इसके बाद उन्हें 1895 में गिरफ़्तार कर हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी।

उन्होंने अपने जीवन काल में ही ‘महापुरुष’ की उपाधि प्राप्त कर ली थी। साथ ही उन्हें लोग ‘धरती बाबा’ के नाम से पुकारते थे। सन् 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेजी सिपाहियों के बीच कई युद्ध संघर्ष होते रहे। बिरसा और उनके चाहने वालों ने अंग्रेजों की रातों की नींद उड़ा रखी थी।

अगस्त 1897 में बिरसा और उनके 400 सिपाहियों ने खूँटी थाने पर अपने तीर कमानों से लैस होकर धावा बोला था। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेजी सेना से हुई जिसमें अंग्रेजी सेना परास्त हो गई लेकिन बाद में इलाके के कई आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारीयां हुई।

जनवरी 1900 डोम्बरी पहाड़ पर एक और बड़ा संघर्ष हुआ, जिसमें कई औरतें व बच्चे मारे गये थे।

जिसके बाद बिरसा मुंडा के कई शिष्यों की गिरफ्तारी हुई और अंत में बिरसा मुंडा 3 मार्च 1900 चक्रधरपुर से गिरफ्तार किए गए थे।

आखिरकार 9 जून 1900 को रांची के जेल में अंग्रेजों द्वारा जहर देने के बाद बिरसा मुंडा ने अपनी आखिरी सांस ली थी।

इनको झारखंड सहित देश के कई हिस्सों सम्मानित किया जाता है और इनकी मूर्तियां कई जगह स्थापित है।