निधन-श्रद्धांजलि

Lal Bahadur Verma : नामचीन इतिहासकार आज खुद हो गए इतिहास, नहीं रहें प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा, समझे उनका जीवन

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कोरोना के प्रहार का शिकार, एक और सितारा इस दुनिया को अलविदा कह गया। प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा (Prof Lal Bahdur Verma) 17 मई को इस दुनिया को अलविदा कह गए। इतिहास के बारे में बताने वाला शख्स आज खुद इतिहास का हिस्सा हो गया है।

बिहार में जन्मे और उत्तरप्रदेश के एक छोटे से कस्बे में पले बढ़े लाल बहादुर 83 वर्ष की आयु में दुनिया छोड़ गए। नामचीन इतिहासकार प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा पिछले कुछ दिनों से कोरोना से संक्रमित थे और देहरादून स्थित इंद्रेश अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।

तबियत में हो रहा था सुधार पर हृदय गति रुकी

संक्रमण के कारण 5 मई को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बीते शुक्रवार, 14 मई को उनकी स्थिति में सुधार भी हो रही थी। लेकिन 16 मई के रात उनकी हृदयगति रुक गई। वे किडनी की बीमारी से भी ग्रसित थे। 17 मई को देहरादून में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। परिवार में उनकी पत्नी, बेटा सत्यम वर्मा और बेटी आशु है। उनके निधन की जानकारी मिलने पर शहर के साहित्यकारों, संस्कृत कर्मियों और शिक्षकों में शोक की लहर दौड़ गई।

छोटे से कस्बे से निकल कर पेरिस का सफर

प्रोफेसर वर्मा की प्रारम्भिक शिक्षा आनंदनगर, गोरखपुर में प्राप्त की थी। गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक, लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और गोरखपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधियों प्राप्त करने के साथ वो फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस तक शिक्षा प्राप्त करने गए थे। लाल बहादुर वर्मा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग में 1991 से 1998 तक अध्यापन किया था।

वामपंती विचारधारा की वजह से नहीं मिली वो पहचाना जिसके थे हक़दार

प्रोफेसर वर्मा ने इतिहास लेखन को नई ऊंचाई दी। उनकी लिखी पुस्तकें देश के अधिकतर विश्वविद्यालयों के किसी न किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। लाल बहादुर वर्मा की पुस्तकों और लेखों को पढ़कर बहुत से लोगों को अपना इतिहास-बोध विकसित करने में मदद मिली है। हालांकि वामपंती विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा के कारण उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वो हक़दार थे।

इतिहास बोध था मिशन

प्रो. वर्मा इतिहास के एक्टिविस्ट थे। इतिहासबोध उनका मिशन था। इतिहासबोध नाम की पत्रिका उन्होंने भट समय तक प्रकाशित की थी। बाद में वो ऐसे बुलेटिन के तौर पर समय-समय पर प्रकाशित करने लगे थे। वो अपने किताबों और लेखों से एक तरह का ख्वाब पैदा करते थे। वह ख्वाब था समानता और आजादी का। वह इतिहास, साहित्य, नाटक, गीत, शोध- शिक्षण, आंदोलन, यात्राएं, आत्मकथा और तमाम मुहिमों के जनक थे। प्रो. वर्मा एक साथ वैश्विक चिंतक, इतिहासकार, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं बुद्धिधर्मी थे। वो गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके थे।

हिंदी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा मे डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें हुई हैं प्रकाशित

प्रो. वर्मा की हिन्दी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘यूरोप का इतिहास’, ‘इतिहास के बारे में’ ‘आधुनिक विश्व का इतिहास’ इत्यादि शामिल हैं। इसके अलावा उनकी कई किताबों का अंग्रेजी और फ्रेंच में अनुवाद भी हुआ है। प्रो. लाल बहादुर वर्मा एक मार्क्सवादी विचारक, प्रखर इतिहासकार, सुयोग्य शिक्षक और संपादक के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे।

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