निधन-श्रद्धांजलि

Kaifi Azmi : मोहब्बत और बग़ावत के अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी की आज पुण्यतिथि

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“तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो।” ये पंक्ति आज भी किसी के दिल में छुपे दर्द के साथ, होठों पर दिख रही मुस्कान को बयां करने का सबसे अच्छा जरिया है। जब कोई इंसान ये समझ लेता है की वो कितना बेवक़ूफ़ है और उसे उसका वो सुकून नहीं मिल सकता जो वो चाहता है तो शायद दुनिया को दिखाने के लिए उसे बनावटी हंसी हंसना पड़ता है, क्यूंकि इस व्यस्त दुनिया में उसे समझने वाला कोई नहीं है, वो इंसान भी नहीं जो उसका सुकून बन गया था। वह इंसान अपनी ख़ुशी किसी और चीज़ों में ढूंढने की कोशिश ज़रूर करता है पर वो यादें, चाहे वो अच्छी हो या कड़वी, शायद उसका पीछा नहीं छोड़ती है।

वैसे तो किसी भी इंसान की ख़्वाहिशों की कोई इन्तिहा नहीं होती और इस बनावटी दुनिया में, लोगों को एक बनावटी हंसी हंसने की आदत सी हो गयी है। ऐसी ही अपने दिल की हर एक बात को बहुत ही आसान लफ्जों में अपनी शायरी में कहने वाले Kaifi Azmi की आज पुण्यतिथि है। आज 10 मई है आज ही के दिन यानी की 10 मई 2002 को हिंदुस्तान का आलातरीन ये शायर दुनिया को अलविदा कह गया था। मोहब्बत और बग़ावत के अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी के गीतों-ग़ज़लों में वतन की मिट्टी की ख़ुश्बू और मज़लूमों का दर्द झलकता था। उनकी नज़्मों में इंसानियत और अमीरी-ग़रीबी और स्त्री-पुरुष की बराबरी का पैग़ाम था।

आईये जानते हैं इस बेहतरीन शायर कैफ़ी आज़मी के जीवन से जुड़ी कुछ बातें-

  • कैफी आजमी साहब का जन्म आजमगढ़ के फूलपुर तहसील अंतर्गत मेजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को जमींदार परिवार में हुआ था।
  • उनका असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी (Athar Husain Rizvi) था।
  • गांव के भोलेभाले माहौल में उन्हें कविताएं पढ़ने का शौक लगा और उन्होंने 11 साल की उम्र में अपनी पहली गज़ल(Gazal) लिखी।
  • उन्हाेंने गरीबों के दर्द को अपनी शायरी में इस कदर पिरोया के मजलूमों की आवाज इंकलाब बनकर उभरे।
  • अपनी मेधा को धार देेने के लिए कैफी आजमी को गांव से निकलने को कई तरह के जतन करने पड़े।
  • वर्ष 1936 में वे साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली।
  • 1943 में साम्यवादी दल ने मुंबई कार्यालय शुरू किया और ‍उन्हें जिम्मेदारी देकर भेजा। यहां आकर कैफी ने उर्दू जर्नल ‘मजदूर मोहल्ला’ का संपादन किया।
  • उनका पहला कविता संग्रह “झंकार” (Jhankar) 1943 में प्रकाशित हुआ था।
  • आज़मी अपनी पत्नी Shaukat Azmi से एक मुशायरा में मिले, जहाँ वह भाग लेने गए थे। वह इस कदर उनके प्यार में पड़ गये की उन्होंने शादी करने का फैसला किया।
  • आर्थिक रूप से संपन्न और साहित्यिक संस्कारों वाली शौकत को कैफी के लेखन ने प्रभावित किया। मई 1947 में दो संवेदनशील कलाकार विवाह बंधन में बंध गए।
  • उनके यहां एक बेटी और एक बेटे का जन्म हुआ, जिनका नाम Shabana Azmi और Baba Azmi है। शबाना आज़मी हिंदी फिल्मों की एक अज़ीम अदाकारा बनीं।
  • प्रगतिशील साहित्यकारों के संपर्क ने उनके लेखन ओर व्यक्तिव को कुछ इस तरह माजा कि वे उर्दू के न सिर्फ प्रगतिवादी शायरों में शुमार हुए, बल्कि हजारों गीत, गजल, शायरी की रचनाएं कर सफलता की ऊंचाइयों को छुआ।
  • आज़मी ने मुंबई में अपने दिनों के दौरान, एक उर्दू अखबार, कौमी जंग (Qaumi Jung) के लिए भी लिखा था।
  • उन्होंने पहला गीत ‘बुजदिल’ फ़िल्म के लिए लिखा था।
  • कैफी की भावुक, रोमांटिक शायरी मृत कड़ियाँ और प्रभावी लेखनी से प्रगति के रास्ते खुलते गए और वे सिर्फ गीतकार ही नहीं बल्कि पटकथाकार के रूप में भी स्थापित हो गए।
  • अपने गांव मिजवान में कैफी ने स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और सड़क बनवाने में मदद की।
  • उन्होंने महिलाओं के उत्थान के लिए अपने गांव में एक आर्गेनाईजेशन स्थापित किए।
  • लड़कियों की शिक्षा के बारे में चिंतित, आज़मी ने Kaifi Azmi Higher Secondary School for Girls, the Kaifi Azmi Inter-College for Girls, Kaifi Azmi Computer Training Centre, the Kaifi Azmi Embroidery और महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र की स्थापना की।
  • उन्हें लेखन के क्षेत्र में उनके काम के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
  • उन्हें महाराष्ट्र उर्दू अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू अकादमी पुरस्कार और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार भी दिए गए।
  • उन्हें विश्व भारती विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि दी गई।
  • उनकी रचनाओं में आवारा सज़दे, इंकार, आख़िरे-शब आदि प्रमुख हैं।
  • 10 मई 2002 को कैफी यह गुनगुनाते हुए इस दुनिया से चल दिए की “ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं।”