कला-संस्कृति

पैरलाइज़्ड होकर भी नहीं छोड़ा संगीत का साथ, ऐसे थे उस्ताद “बड़े गुलाम अली खां साहब”

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ठुमरी गायन को नया आयाम देने वाले “बड़े गुलाम अली खां” की आज है 119वीं जयंती। ख्याल गायन के लिए भी थे मशहूर। उनकी जयंती पर जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

बड़े गुलाम अली खां (Bade Gulam Ali Khan) का जन्म 2 अप्रैल 1902 में अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था। उनका जन्मस्थान अभी पाकिस्तान (Pakistan) के पंजाब में है।

वो एक भारतीय शास्त्रीय गायक थे और अपने मखमली आवाज़ के लिए मशहूर थे।

उनके पिता “अली बख्स खां” महाराजा कश्मीर के दरबारी गायक हुआ करते थे, इसलिए उनका घराना कश्मीरी घराना कहलाया। खां साहब का परिवार बाद में पटियाला में रहने लगा तो उनके घराने का नाम पटियाला घराना कहलाया।

बड़े गुलाम अली खां ने पहली बार 1919 में लाहौर संगीत सम्मेलन में प्रस्तुति दी थी।

उन्हें पहचान 1938 के कलकत्ता सम्मेलन ने दिलाई।

खां साहब विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे पर वहां उनका मन नहीं लगा और वो भारत लौट आये।

उन्हें 1962 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (Sangeet Natak Akadami Award) से सम्मानित किया गया था।

देश के सबसे उच्च सम्मानों में से एक, “पद्मा भूषण” (Padma Bhushan) से ‘बड़े गुलाम अली खां’ को 1962 में सम्मानित किया गया था।

बड़े गुलाम अली खां जी की मृत्यु 22 अप्रैल 1962 को हैदराबाद (Hyderabad) के बशीरबाग़ (Basheerbagh) पैलेस में हुआ।

वो अपने ज़िन्दगी के आखिर दिनों में पैरलाइज़्ड थे फिर भी अपने बेटे ‘मुनवर अली खां’ की मदद से स्टेज पर अपनी प्रस्तुति दिया करते थे।

फ़िल्मकार हरिसधन दासगुप्ता (Harisadhan Dasgupta) ने 1968 उनके जीवन के ऊपर एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी जिसका नाम उन्होंने ‘बड़े गुलाम अली खां साहब’ रखा था।

बड़े गुलाम अली खां के निधन के बाद उनके सम्मान में हैदराबाद के बशीरबाग़ स्ट्रीट का नाम “उस्ताद बड़े गुलाम अली मार्ग” रखा गया।