हिंदी पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू होती है, जो एकादशी की तिथि को समाप्त होती है। हर साल की तरह इस बार भी भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा निकाली जा रही है, लेकिन कड़ी शर्तो के साथ। सुप्रीम कोर्ट ने कल कुछ प्रतिबंधों के साथ कोरोना वायरस महामारी के बीच वार्षिक रथ यात्रा को आयोजित करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक 500 से अधिक लोगों को रथ खींचने की अनुमति नहीं दी जाएगी। रथयात्रा के दौरान पुरी शहर में सोमवार की रात आठ बजे से कफ्र्यू लागू रहेगा। इस दौरान लोग अपने घरों में ही रहंगे। रथयात्रा की से पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह ने देशवासियों को शुभकामनाएं दी।

कालांतर से यह पर्व श्रद्धा और भक्ति पूर्वक मनाया जाता है। इस यात्रा में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम अपनी बहन सुभद्रा को नगर की सैर कराते हैं। आइए, शुभ मुहूर्त और महत्व जानते हैं-

आषाढ़ माह में द्वितीया तिथिमें 11 बजकर 59 मिनट से शुरू होकर अगले दिन 23 जून को दिन में 11 बजकर 19 मिनट तक है। अतः रथ यात्रा का आयोजन दोपहर में किया जा सकता है। इसे श्रद्धालु लाइव देख सकते हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा धार्मिक पक्ष

द्वापर काल से इस यात्रा का आयोजन किया जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने उनसे नगर भ्रमण की इच्छा जाहिर की। इसके बाद सुभद्रा के नगर भ्रमण के लिए रथ यात्रा का आयोजन किया गया। इस यात्रा के लिए तीन रथ बनाए गए और इन रथ पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने बहन सुभद्रा को नगर भ्रमण कराया था।कालांतर से यह परंपरा चलती आ रही है। आधुनिक समय में तीन लकड़ी के रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ होता है, जिसमें 16 पहिए लगे होते हैं। जबकि बलराम के रथ में 14 और सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं, जिसे श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं।

इस रथ यात्रा की दूसरी कथा अनुसार भगवान जगन्नाथ का जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होता है। इसके बाद उन्हें मंदिर में स्थित सरोवर में 108 कलशों से स्नान कराया गया, जिससे उन्हें ज्वर और ताप आ गया। उस समय भगवान जगन्नाथ 15 दिन तक अपने कक्ष से नहीं निकले। इसके बाद आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवन नगर भ्रमण और भक्‍तों को दर्शन देने निकले। इस भ्रमण में उनके साथ बलराम और सुभद्रा भी थी।

पुरी एक ऐसा स्थान है, जिसे हजारों वर्षों से कई नामों जैसे- नीलगिरी, नीलाद्रि, नीलांचल, पुरुषोत्तम, शंखश्रेष्ठ, श्रीश्रेष्ठ, जगन्नाथ धाम, जगन्नाथ पुरी – से जाना जाता है। भगवन जगन्नाथ को भी कई नामों से जाना जाता है

भगवान जगन्नाथ का रथ- इसके तीन नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। 16 पहियों वाला ये रथ 13 मीटर ऊंचा होता है। रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है। ये सफेद रंग के होते है। सारथी का नाम दारुक है। रथ पर हनुमानजी और नरसिंह भगवान का प्रतीक होता है। रथ पर रक्षा का प्रतीक सुदर्शन स्तंभ भी होता है। इस रथ के रक्षक गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाती है। रथ की रस्सी को शंखचूड़ कहते हैं। इसे सजाने में लगभग 1100 मीटर कपड़ा लगता है।

बलभद्र का रथ- इनके रथ का नाम तालध्वज है। रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है। इसके रक्षक वासुदेव और सारथी मातलि हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। यह 13.2 मीटर ऊंचा और 14 पहियों का होता है। लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के घोड़े नीले रंग के होते हैं।

सुभद्रा का रथ- इनके रथ का नाम देवदलन है। रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। इसकी रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन हैं। रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जीता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचूड़ा कहते हैं। ये 12.9 मीटर ऊंचा और 12 पहियों वाला रथ लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों से बनता है। रथ के घोड़े कॉफी कलर के होते हैं।