90 के दशक में आवागमन का सबसे सुलभ साधन साइकिल ही हुआ करता था। ज्यादातर लोग कही भी जाने के लिए साईकिल का ही उपयोग किया करते थे। स्कूल, कॉलेज से लेकर कार्यस्थल तक जाने के लिए साइकिल पसंदीदा सवारी होती था।समय के साथ ही साईकिल का वो क्रेज अब सिर्फ बच्चो तक ही सीमित होता चला गया। हालाँकि हम सभी जानते है कि साइकिल चलाना हमारे सेहत के लिए तो फायदेमंद है ही, पर्यावरण के लिए भी अच्छा है। साइकिल चलने से हमारी इम्युनिटी भी बढ़ती है।

कोरोना और लॉकडाउन के इस कठिन दौर में एकबार फिर साइकिल अपने नए तेवर व उम्मीदों के साथ लोगों के दिलो-दिमाग पर दस्तक दे रही है। साइकिल सुर्खियों में है। उत्तर प्रदेश के गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा होते हुए अमेरिका तक चर्चा में है।  परदेस लौटने वाले सैकड़ों मजदूरों के लिए यही इसबार सहारा साबित हुई।  1930 में  साइकिल 50 रुपये में बिकती थी, आज इसके ट्यूब का दाम करीब 200 रुपये हैं। सोचिए, जमाना कहां से कहां पहुंच गया, लेकिन साइकिल वहीं का वहीं है। मेडिकल साइंस के अनुसार यदि आपका वजन 70 किलो है तो आधे घंटे में 298 कैलोरी बर्न कर सकते हैं। अच्छी सेहत के लिए इतना पर्याप्त है।

पहली बार विश्व साइकिल दिवस 3 जून 2018 को मनाया गया था।  ये दिवस परिवहन के एक सरल, किफायती, भरोसेमंद और पर्यावरण की सुरक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है।  परिवहन के एक सरल, किफायती, भरोसेमंद और पर्यावरण की सुरक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। कोरोना काल में इस दिवस की प्रासंगिकता बढ़ गई है। भारत में साइकिल के पहियों ने आर्थिक तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद कई दशकों तक साईकिल यातायात का जरूरी हिस्सा रही। 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल थी। यह महत्वपूर्ण और किफायती साधन था। भारतीय डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल से चलता था। आज भी डाकिया साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं।

गांवों में किसानों के लिए मंडियों तक फसलों को पहुंचाने का साधन रहा, जो आज भी है। दूध बिक्रेताओं के लिए यह आज भी महत्वपूर्ण साधन है। वहीं मजदूरों के लिए यह बड़े काम का वाहन है।