विश्व पीरियड डे एक ऐसा मंच है, जो मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए गैर सरकारी संगठनों, सरकारी संस्थाओं, निजी क्षेत्र, मीडिया और हर व्यक्ति को एक साथ लाता है।  इस बार विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस की थीम ‘ Periods do not stop for pandemics in light of the coronavirus crisis’ रखी गई है। आज से नहीं काफी समय पहले से पीरियड्स के दौरान लड़कियों के साथ थोड़ा अलग सा बर्ताव किया जाता रहा है, जिसके चलते वह टेंशन में और काफी चिड़चिड़ी रहती हैं। इस वक़्त उन्हें अपना खास ख्याल रखने की जरुरत होती है।

पीरियड्स को लेकर इतनी जागरुकता होने के बाद भी लड़कियां इस पर खुलकर बाद करने पर संकोच करती हैं।  ये ऐसे दिन होते है। जब एक लड़की शारीरिक के साथ-साथ मानसिक समस्या से भी गुजरती हैं। ऐसे में साफ सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए। जिससे कि इंफेक्शन के साथ-साथ उसकी इनफर्टिलिटी से संबंधी कोई समस्या न हो। पीरियड के जागरूकता को एक कदम और आगे बढाने  के  साथ  संकोच को ख़त्म करने के लिए कई महिला कलाकारों और आम महिला भी अपने हाँथ पे खून की एक बून्द के साथ सोशल मीडिया पर अपनी फोटो शेयर कर रहीं है।

पूरी दुनिया में 28 मई को विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। इसे बनाने का मुख्य कारण है महिलाओं को पीरियड्स के समय स्वस्छता के लिए जागरुक करना। मासिक धर्म स्वच्छता दिवस की शुरूआत साल 2013 में वॉश (जल स्वच्छता एवं स्वास्थ्य रक्षा) द्वारा की गयी थी और इस दिवस को पहली बार 28 मई 2014 में मनाया गया था।  इसके साथ ही पीरियड्स 28 दिनों के अंदर आता है। इसलिए ये 28 मई को मनाई जाती है।

 भारत में अधिकांश जगह आज भी माहवारी पर बात करने में लोगों को शर्म महसूस होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक माहवारी की जानकारी के अभाव के चलते 23 प्रतिशत लड़कियों  को स्कूल छोड़ना पड़ता है । जागरूकता के अभाव में देश की आधी आबादी को कई शारीरिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है।  

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इस चीज के प्रति अब लोगों की सोच बदल रही है।  व्यापक स्तर पर भले ही ना हो, लेकिन फिर भी आज की लड़कियां, अब उन मुश्किल दिनों के बारे में अपनों के बीच में खुलकर बातें करनी लगी हैं।  जो कि वेबसाइट-इंस्टाग्राम इस बदलाव का ज्वलंत उदाहरण है। फिल्म और वेब सीरीज में भी पीरियड्स और इसके द्वारा होने वाले मूड स्विंग को विस्तारपूर्वक दिखाया जा रहा है। लड़किया अब लड़को के साथ भी पीरियड्स के ऊपर खुल कर बातें कर रही है।    विशेषज्ञों की राय में यह एक खूबसूरत और सराहनीय कदम है।  क्योंकि अब वक्त आ गया है कि इन बातों को लेकर इंसान अपनी चुप्पी तोड़े। आज के बदले परिवेश में लड़कियां बाहर निकल रही हैं, कभी पढ़ने के लिए तो कभी नौकरी के लिए, ऐसे में अगर वो मासिक धर्म को लेकर सकुचायी रहेंगी तो वक्त के साथ चल कैसे पाएंगी।

टीवी, इंटरनेट पर आज हर तरह की सामग्री मौजूद है जिसने लोगों की सोच मासिक धर्म के बारे में बदली है लेकिन अभी भी काफी लोग इस बारे में खुलकर बातें नहीं कर रहे हैं। आज भी देश के कई परिवारों में लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान परिवार से अलग थलग कर दिया जाता है।  मंदिर जाने या पूजा करने की मनाही होती है, रसोई में प्रवेश वर्जित होता है। यहां तक कि उनका बिस्तर अलग कर दिया जाता है और परिवार के किसी भी पुरुष सदस्य से इस विषय में बातचीत न करने की हिदायत दी जाती है। लोगों को समझना होगा कि मासिक धर्म कोई अपराध नहीं है बल्कि प्रकृति की ओर से दिया गया महिलाओं को एक तोहफा है। इसके लिए पहले घर में बच्चियों की माएं ही  अपनी सोच बदलें और इस बारे में अपनी बेटियों को ठीक से बतायें ताकि उनकी बेटी को किसी के सामने शर्मिंदा ना होना पड़े और वो हर बात से जागरूक रहे।

डाक्टरों का मानना है कि मासिक धर्म के बारे में बताने वाली सबसे अच्छी जगहें स्कूल हैं, जहां इस विषय को यौन शिक्षा और स्वच्छता से जोड़कर चर्चा की जा सकती है। इसके लिए जागरूक और उत्साही शिक्षकों की जरूरत है, जो विद्यार्थियों को मासिक धर्म से जुड़ी महत्वपूर्ण बातों के विषय में जानकारी दे सकें।

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