घर को संवार सकें…
ये हसरत लेकर घर से निकले थे लोग ।।
है किसकी गलती, किसकी नज़र लगी
आज भूखे पेट घर लौटने पर विवश हैं लोग ।।
बिखरे ख्वाब वो समेटे तो किस तरह
खंडित स्वप्न संवारे तो वो किस तरह
कलपते मंजर देख चहुंओर स्तब्ध हैं लोग ।।
नहीं है कुछ भी साधन और जाना है दूर तलक
उजड़े आशियाने, खामोश है ये ज़मीं और फलक
क्यों अनजान बने हुए हैं इस तरह शहर के लोग।।
माना कि इस वक्त तबाह हैं सबके – सब चहुंओर
विवश है मानव नहीं चल रहा है इसका कोई  ज़ोर
हां.. हां..क्या अमीर क्या गरीब घर के लोग  ।।
कोई कोरोना के खौफ से क़ैद है घर में
पर वो क्या करें…
जो बेघर हो गएं हैं इस कदर इस खौफ से लोग ।।
आओ मिलकर सब अपना जमीर जगा लें
करें मदद, दें सहारा और उन्हें अपना लें 
आज घर के तलाश में जो भटक रहें हैं लोग ।।
डॉ अजय कुमार
अंग्रेजी विभाग
पटना काॅलेज
पटना विश्वविद्यालय ,पटना