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संगीत हीं हैं इनकी पहचान, इनका भगवान…91 साल से खाली पैर ही करतीं हैं गानों की रिकार्डिंग

फिल्म इंडस्ट्री में 75 साल से अधिक समय से सक्रिय, 36 भाषाओं में 50 हजार से भी अधिक गीत गाते हुए भारत रत्न लता मंगेशकर (lata Mangeshkar) आज 91वां जन्मदिवस मना रही हैं। स्वर साम्राज्ञी, बुलबुले हिंद और कोकिला जैसे सारे विशेषण जो लता मंगेशकर के लिए गढ़े गए नके रिकॉर्ड ही ऐसे -ऐसे हैं कि फिल्मी दुनिया के कई काल के गायक-गायिका इससे पार नहीं पा सकते।

महाराष्ट्र में एक थिएटर कंपनी चलाने वाले अपने जमाने के मशहूर कलाकार दीनानाथ मंगेशकर की बड़ी बेटी लता का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ। मधुबाला से लेकर माधुरी दीक्षित और काजोल तक हिंदी सिनेमा के स्क्रीन पर शायद ही ऐसी कोई बड़ी अभिनेत्री रही हो, जिसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज उधार न दी हो। लोग इन्हे प्यार से लता दीदी कहते हैं। लता दीदी को गायिकी क्षेत्र में अतुल्य योगदान देने के लिए भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड सहित कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

बचपन

1942 में मराठी फिल्मों में एक्टिंग करने वालीं लता मंगेशकर ने अपने करियर की शुरुआत 13 साल की उम्र में की थीं। ‘किती हासिल’ नाम की मराठी फिल्म में उन्होंने मराठी गीत भी गाया था हालांकि गीत को फिल्म में शामिल नहीं किया गया, लेकिन गायकी का उनका सफर वहीं से शुरू हुआ।

सपने में आए थे पिता

लता जी मानती हैं कि पिता की वजह से ही वे आज सिंगर हैं, क्योंकि संगीत उन्होंने ही सिखाया। एक बार लता के पिता के शिष्य चंद्रकांत गोखले रियाज कर रहे थे। दीनानाथ किसी काम से बाहर निकल गए। पांच साल की लता वहीं खेल रही थीं। पिता के जाते ही लता अंदर गई और गोखले से कहने लगीं कि वो गलत गा रहे हैं। इसके बाद लता ने गोखले को सही तरीके से गाकर सुनाया। पिता जब लौटे तो उन्होंने लता से फिर गाने को कहा। लता ने गाया और वहां से भाग गईं। इसके बाद लता और उनकी बहन मीना ने अपने पिता से संगीत सीखना शुरू किया। पिता की मौत के बाद लता ने ही परिवार की जिम्मेदारी संभाली और अपनी बहन मीना के साथ मुंबई आकर मास्टर विनायक के लिए काम करने लगीं। लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर की हृदय रोग के चलते 1942 में निधन हो गया था। बंबई नाट्य महोत्सव के आयोजन से पहले वे लता के सपने में नजर आए। वहां से हुई शुरुआत के बाद लता मंगेशकर ने कभी मुड़कर नहीं देखा।

गाने का मौका देने से इनकार

लता मंगेशकर को शुरू के वर्षों में काफी संघर्ष करना पड़ा कई फिल्म प्रोड्यूसरों और संगीत निर्देशकों ने यह कहकर उन्हें गाने का मौका देने से इनकार कर दिया कि उनकी आवाज बहुत महीन है। लता का सितारा पहली बार 1949 में चमका और ऐसा चमका कि उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती, इसी वर्ष चार फिल्में रिलीज हुईं, ‘बरसात’, ‘दुलारी’, ‘महल’ और ‘अंदाज’। ‘महल’ में उनका गाया गाना ‘आएगा आने वाला आएगा’ के फौरन बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने मान लिया कि यह नई आवाज बहुत दूर तक जाएगी।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज

उन्होंने इतना गाया कि सर्वाधिक गाने रिकॉर्ड करने का कीर्तिमान ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में 1974 से 1991 तक हर साल अपने नाम दर्ज कराती रहीं। 1974 में लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में परफॉर्म करने वाली वे पहली भारतीय हैं। उनकी आवाज हमेशा अप्रभावित रही।

गुलजार ने की लता

1977 में फिल्म ‘किनारा’ में लता मंगेशकर के लिए एक गाना लिखा गया। आज जब भी लता का नाम आता है उस गाने का जिक्र जरुर होता है- ‘मेरी आवाज ही पहचान है’। ‘नाम गुम जाएगा’ टाइटल का ये गाना लता के लिए गुलजार ने लिखा। गुलजार उनकी गायिकी की तारीफ में कहते हैं, ”लता की आवाज हमारे देश का एक सांस्कृतिक तथ्य है, जो हम पर हर दिन उजागर होता है. उनकी मधुर आवाज सुने बगैर शाम नहीं ढलती- सिवा की आप बाधिर ना हों।”

लता कहती हैं, “हां, वो कमाल का गीत था। वाकई जैसे उन्होनें मेरे मन की बातों को पन्ने पर उतार दिया और इसी वजह से यह मेरी व्यक्तिगत पसंद भी है और मैं हमेशा उनकी शुक्रगुज़ार रहूंगी कि उन्होनें इतना सुंदर गीत मेरे लिए लिखा।”

आज भी स्टूडियों में चप्पल उतार के जाती हैं

सुरीली आवाज और सादे व्यक्तित्व के लिए विश्व में पहचानी जाने वाली संगीत की देवी लता आज भी गीत रिकार्डिंग के लिए स्टूडियो में प्रवेश करने से पहले चप्पल बाहर उतार कर अंदर जाती हैं।