धर्म

चांद के दीदार से सुहागिन बनती है अखंड सौभाग्यवती

karwa-chauth

करवाचौथ विवाहित जोड़ों के लिए एक विशेष दिन है। प्रतिवर्ष करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस वर्ष यह देश भर में 4 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन विवाहित महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास करती हैं और अपने पति के स्वास्थ्य, सुरक्षा और लंबे जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। यह व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए किया जाता है।

करवा चौथ का त्‍योहार दीपावली से नौ दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन विधि-विधान से माता पार्वती और भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है। पूजा-अर्चना करने के बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। फिर रात को छलनी से चांद दर्शन के बाद उनको अर्घ्य ​दिया जाता है और पति से जल ग्रहण करने के बाद व्रत संपन्न किया जाता है।

करवा चौथ व्रत कथा के अनुसार एक साहूकार के सात बेटे और करवा नाम की एक बेटी थी। एक बार करवा चौथ के दिन उनके घर में व्रत रखा गया। रात को जब करवा के भाइयों ने उससे भोजन करने का निवेदन किया तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि अभी चांद नहीं निकला है। वह चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही भोजन करेगी। अपनी सुबह से भूखी-प्यासी बहन की हालत भाइयों से नहीं देखी गयी। सबसे छोटा भाई दूर एक पीपल के पेड़ में एक दीपक जला देता है और अपनी बहन से बोलता है कि चांद निकल आया व्रत तोड़ लो। बहन ने अपने भाई पर विश्वास किया और उसने दीपक रूपी चांद को देखकर खाने का निवाला खा लिया। निवाला खाते ही उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला। शोक में आतुर होकर वह अपने पति के शव को लेकर एक वर्ष तक बैठी रही और उसके ऊपर उगने वाली घास को इकट्ठा करती रही। अगले वर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को उसने पूरे विधि-विधान से करवा चौथ व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उसका पति फिर से जीवित हो गया।

करवा चौथ के दिन सरगी का भी विशेष महत्व है। सरगी आमतौर पर सास तैयार करती है। इसमें सूखे मेवे, सवई, नारियल, फल और मिठाई खाई जाती है। सरगी सुबह सूरज उगने से पहले खाई जाती है ताकि दिन भर ऊर्जा बनी रहे। चंद्रमा के दर्शन के लिए थाली सजाई जाती है जिसमें अक्षत, कुमकुम, दीपक, सिन्दूर, रोली तथा चावल की बनी मिठाई होती है। सुहागिनों के लिए यह करवा चौथ अखंड सौभाग्य देनेवाला होता है।