धर्म

जिनकी नहीं है समाज में कोई मान उनके बिना अधूरी है मां का सम्मान

शिवांजलि छाया

भारत कई त्योहारों का देश है। यहां हर प्रांत के अपने त्योहार और पर्व हैं। पुरे देश में दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं ,हलांकि कोरोना को देखते हुए काफी सावधानियां भी बरती जाएँगी। दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की भव्य मूर्तियों का एक खास महत्व होता है और इसे बनाने के लिए एक खास तरह की मान्यता है। ये हैरान कर देने वाली बात है कि जिस समाज में सेक्स वर्कर्स को बराबर का दर्जा नहीं मिलता, उसी देश में मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए उन्हीं के आंगन की
मिट्टी की जरूरत होती है।

पूरे भारत में लोकप्रिय इस पूजा के लिए एक विशेष मिट्टी से माता की प्रतिमा का निर्माण होता है और उस मिट्टी का नाम है निषिद्धो पाली। निषिद्धो पाली वेश्याओं के घर या क्षेत्र को कहा जाता है। सेक्स वर्कर के घर के बाहर की मिट्टी को मूर्ति में लगाए जाने की मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति वेश्यालय के द्वार पर खड़ा होता है तो अंदर जाने से पहले अपनी सारी पवित्रता और अच्छाई को वहीं छोड़कर प्रवेश करता है, यही कारण है की यहां की मिट्टी पवित्र मानी जाती है। ऐसी ही एक और मान्यता है कि नारी, ‘शक्ति’ का एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उसकी कहीं गलती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है। इसलिए यहां की मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे उन्हें सम्मान देने का उद्देश्य भी है।

कुछ पौराणिक कथाओं में जिक्र है कि प्राचीन काल में एक वेश्या मां दुर्गा की अन्नय भक्त थी। उसे तिरस्कार से बचाने के लिए और लोग उसे समाज में इज्जत की नजरों से देखे इसलिए मां ने स्वयं आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई। माँ दुर्गा ने उसे वरदान दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना प्रतिमाएं पूरी नहीं होंगी।

दुर्गा असल में महिषासुर का वध करने वाली देवी हैं। एक और मान्यता ये भी है कि महिषासुर ने देवी दुर्गा के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया था, उसने उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई थी। इस कारण से वेश्यावृति करने वाली स्त्रियों, जिन्हें समाज में सबसे निकृष्ट दर्जा दिया गया है, के घर की मिट्टी को पवित्र माना जाता है और उसका उपयोग मूर्ति के लिए किया जाता है।

दुर्गा की मूर्ति बनने के लिए सोनागाछी की मिट्टी का इस्तेमाल होता है। सोनागाछी एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया है। सोनागाछी का इलाका कोलकाता में देह व्यापार का गढ़ माना जाता है। कारीगर बताते हैं कि पहले तो पुजारी या फिर मूर्ति बनाने वाले कारीगर, सेक्स वर्कर्स के घरों से भिखारी बनकर मिट्टी मांग कर लाते थे, लेकिन अब इसका कारोबार होने लगा है। इस मिट्टी की कीमत 300 से 500 रुपए बोरी तक पहुंच गई है। इस मिट्टी से बनी एक मूर्ति की कीमत पांच हजार रुपए से लेकर 15 हजार तक होती है।

ईश्वर की सबसे सुंदर रचनाओं में से एक है ;स्त्री।‘ स्त्री को सृजन की शक्ति माना गया है अर्थात स्त्री से ही मानव जाति का अस्तित्व है। ग्रंथों में नारी के महत्व को मानते हुए यह बताया गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते है। नारी का सम्मान ही अच्छे समाज का विकास करती है और उसके लिए समाज में विकसित सभी राक्षसी सोच को मारना जरूरी है।