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देवभूमि के 20 साल

uttarakhand

‘देवभूमि’ के नाम से प्रसिद्ध ‘उत्तराखंड’ का आज 20वां स्थापना दिवस है। यह उत्तरी भारत में स्थित है और एक महान तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है। 9 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से और हिमालय पर्वत श्रृंखला के एक हिस्से से कई जिलों को मिलाकर उत्तराखंड का गठन किया गया था। इसका 27वें राज्य के रूप में गठन हुआ था। 2007 में, राज्य का नाम औपचारिक रूप से उत्तरांचल से उत्तराखंड में बदल दिया गया। स्थापना के समय इसे उत्तरांचल नाम दिया गया था। उत्तराखंड की सीमाएं तिब्बत, नेपाल, हिमाचल प्रदेश, हरयाणा, उत्तर प्रदेश से लगती है।

आजादी के दशकों के बाद भी, उत्तर प्रदेश सरकार हिमालयी क्षेत्र में लोगों के हितों को संबोधित करने की अपेक्षा को पूरा नहीं कर सकी। बेरोजगारी, गरीबी, और बेहतर अवसरों की तलाश में पहाड़ियों से मूलनिवासियों के पलायन ने अंततः एक अलग पहाड़ी राज्य के निर्माण की लोकप्रिय मांग को जन्म दिया। राज्य का दर्जा प्राप्त करने के उद्देश्य से ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ के गठन के बाद, विरोध प्रदर्शनों ने गति पकड़ी और 90 के दशक में इस क्षेत्र में व्यापक राज्य आंदोलन का रूप ले लिया। राज्य के कार्यकर्ताओं ने कई वर्षों तक अपना आंदोलन जारी रखा और परिणामस्वरूप उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को ‘उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000’ द्वारा ‘उत्तरांचल’ के रूप में किया गया।

संस्कृत में उत्तराखंड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। उत्तराखंड ग्लेशियरों, नदियों, घने जंगलों और बर्फ से ढकी पर्वत चोटियों सहित प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। इसकी राजधानी देहरादून है और उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थित है। इसे देवभूमि भी कहा जाता है क्यूंकि यहाँ कई धार्मिक स्थल है और यह भूमि, देश की सबसे पवित्र नदियाँ, गंगा और यमुना का उद्गम स्थल भी है।

उत्तराखंड स्थापना दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री ‘त्रिवेंद्र सिंह रावत’ ‘गैरसैंण’ में एक समारोह में शामिल होंगे और विकास के लिए तेज़ी से कदम बढ़ने पर चर्चा करेंगे। राज्य के ‘जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क’ में बंगाल के बाघ और अन्य देशी वन्यजीव हैं। उत्तखण्ड का सबसे ठंडा महीना जनवरी माना जाता है। दिसंबर और मार्च के बीच राज्य में उत्तरी भाग में बर्फ़बारी होना आम बात है। उत्तराखंड के लगभग सभी चीज़ों में सुंदरता निहित है। इस धन्य भूमि का पूरी तरह से वर्णन करने के लिए कोई भी शब्द कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकता है।