“पिछले तीन वर्षों में औसतन 10% से अधिक की वृद्धि के साथ बिहार ने भारत की विकास दर की तुलना में अधिक वृद्धि दर्ज की है।” जी हां, चौकिये मत ये हम नहीं, बल्कि राज्य का 14वां आर्थिक सर्वेक्षण 2019—20 का रिपोर्ट कह रहा है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में कहा गया है कि बिहार में 10% की वृद्धि हुई है। बिहार और विकास इन दोंनो शब्दों का शोर आजकल तमाम जगहों पर छाया हुआ है। बीते कुछ दिनों में हम सभी ने तमाम तरह के रिर्पोट कार्ड और ब्लू प्रिंट देंखे और सुने हैं। जायज भी है यह चर्चा, लोकतंत्र का पर्व जो आने वाला है। कुछ लोगों का मानना है कि बिहार में विकास तो हुआ है, पर फिजिक्स के नेट डिसपलेसमेंट की तरह। बहरहाल कुछ तो लोग कहेंगे, जितने लोग उतनी बातें। यह तो हम सभी जानते हैं, गीली मिट्टी से मूर्ति बनाना कठिन काम होता है, पर टूटी हुई मूर्ति की मिट्टी से मूर्ति बनाना किस हद तक चुनौतीपूर्ण होता है शायद इसका अंदाजा हम अच्छे से लगा सकते हैं।
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि जंग एक दिन में नहीं जीता जाता। भले आप कितने ही बड़े योद्धा ही क्यों ना हों। ठीक उसी तरह कोई भी सरकार, रातों—रात जादू की छड़ी घुमा कर विकास नहीं ला सकती। बिहार और विकास की बात करें, तो बच्चन जी की वह कविता याद आती है, नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है….फिलहाल अब हम लिटरेचर से निकलते हैं और अब जानेंगे 14वां आर्थिक सर्वेक्षण 2019—20 का रिपोर्ट क्या कहता है। साथ ही बात करेंगे कुछ आंकड़ों की जो विकास के सूचक हैं, फिर आप ही तय कर लें जो आपको उचित लगे।

14वां आर्थिक सर्वेक्षण 2019—20 रिपोर्ट

  • बिहार की प्रति व्यक्ति जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) मौजूदा कीमतों पर 47,541 रुपये है और निरंतर कीमतों पर 33,629 थी। बिहार में अर्थव्यवस्था के मुख्य विकास, जिन्होंने दो अंकों की वृद्धि दर्ज की और 2018-19 के दौरान बिहार की समग्र अर्थव्यवस्था के वास्तविक विकास में योगदान दिया, वे हैं हवाई परिवहन (36%), अन्य सेवाएं (20%), व्यापार मरम्मत सेवाएं (17.6%), सड़क परिवहन (14.0%), और वित्तीय सेवाओं (13.8%)
  • सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार राज्य का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 2.68%, राजस्व अधिशेष जीएसडीपी का 1.34%, और राज्य सरकार का बकाया सार्वजनिक ऋण देयता वर्ष 2018-19 के दौरान जीएसडीपी का 32.34% था।
  •  2018-19 में बिहार की कुल राजस्व प्राप्ति 79 1,31,793 करोड़ और पूंजीगत प्राप्ति, 20,494 करोड़ थी। राज्य में राजस्व व्यय और कुल व्यय क्रमश: 89 1,24,897 करोड़ और 1,54,655 करोड़ थे। राजस्व प्राप्ति में 12.2% की वृद्धि हुई, जबकि राजस्व व्यय में पिछले वर्ष की तुलना में 2018-19 में 21.7% की वृद्धि हुई।
  •  2016-17 में राज्य में अंडे का उत्पादन 111.17 करोड़ से बढ़कर 2018-19 में 176.34 करोड़ हो गया है। वहीं कुल मछली उत्पादन 2013—14 में 4.79 लाख टन था जो अब बढ़कर 2018-19 में 6.02 लाख टन हो गया है। इसी तरह, बिहार में परिचालन कृषि आधारित कारखानों की वार्षिक वृद्धि दर पिछले 10 वर्षों में 16.4% थी, जबकि अखिल भारतीय स्तर पर यह केवल 3.3% थी। प्रमुख रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों ने कहा कि 2017-18 के दौरान राज्य में काम करने वाले पुरुषों के लिए रिपोर्ट कृषि, वानिकी और मछली पालन (44.6%), निर्माण (17.1%), थोक और खुदरा व्यापार, वाहनों की मरम्मत (12.3%) थी। विनिर्माण (9.3%) और महिला श्रमिकों के लिए कृषि, वानिकी, मछली पकड़ने और शिक्षा प्रमुख रोजगार पैदा करने वाले उद्योग रहे हैं। 25% महिलाओं ने शिक्षा क्षेत्र में रोजगार पाया है। लोगों ने कामकाजी हुनर तलाशने के उद्देश्य से बने ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से बीते 5 वर्षों में 1,38,104 लोगों ने ट्रेनिंग ली। इनमें 45% पुरुष और 54% महिलाएं थीं। सरकारी आंकड़ा बताता है कि प्रशिक्षण पाए तीन—चौथाई लोगों को रोजगार मिल चुका है।  
  •  राज्य में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 2012-13 में 145 kwh से बढ़कर 2018-19 में 311 kwh हो गई है। छह वर्षों में 114% की वृद्धि और बिजली की उपलब्धता 6-8 के औसत से बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 20-22 घंटे बिजली की उपलब्धता हुई है 10—12 घंटे के बजाय। वहीं, शहरी क्षेत्रों में 22-24 घंटे तक बिजली की उपलब्धता रही है। राज्य में बिजली क्षमता की उपलब्धता 2018 में 3889 मेगावाट थी, जो बढ़कर 4767 मेगावाट हो गई 2019 में।

आर्थिक सर्वेक्षण क्या है

बजट से एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाता है। जो कि देश या किसी राज्य की आर्थिक स्थिति की दशा और दिशा को बताता है। मूल रूप से यह एक आधिकारिक रिपोर्ट होती है, जिसे इकनॉमिक सर्वे कहा जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण में बताया जाता है कि वर्ष के दौरान विकास की प्रवृत्ति क्या रही। किन-किन योजनाओं को अमल में लाया और इनके क्या-क्या संभावित परिणाम सामने आने वाले हैं। इस तरह के सभी पहलुओं पर सूचना दी जाने के साथ अर्थव्यवस्था, पूर्वानुमान और नीतिगत स्तर पर चुनौतियों संबंधी विस्तृत सूचनाओं को भी इसमें शामिल किया जाता है।

सर्वेक्षण कृषि और औद्योगिक उत्पादन, बुनियादी ढांचे, रोजगार, धन की आपूर्ति, कीमतों, आयात, निर्यात, विदेशी मुद्रा भंडार और अन्य प्रासंगिक आर्थिक कारकों के रुझानों का विश्लेषण करता है, जिसका विकास पर असर पड़ता है और बजट में ध्यान देने की आवश्यकता होती है। हालांकि, संविधान सरकार को आर्थिक सर्वेक्षण पेश करने के लिए बाध्य नहीं करता है। लेकिन वर्षों से केंद्रीय बजट से पहले हर सरकार के लिए आर्थिक सर्वेक्षण पेश करना आम बात हो गई है।

आर्थिक सर्वेक्षण को कौन करते हैं पेश

आर्थिक सर्वेक्षण मुख्य आर्थिक सलाहकार के मार्गदर्शन में तैयार किया जाता है। इसे बजट की घोषणा से एक दिन पहले संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है।

आर्थिक सर्वेक्षण का महत्व

आर्थिक सर्वेक्षण महत्व रखता है। क्योंकि, यह आम लोगों को देश के आर्थिक मामलों की स्थिति से अवगत कराता है और उन्हें सरकार के प्रमुख आर्थिक फैसलों के बारे में जागरूक करता है जो उनके जीवन को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण सरकार को नीतिगत बदलावों की भी सिफारिश करता है, जो हालांकि बाध्यकारी नहीं है। लेकिन, केवल राष्ट्रीय नीतियों को तैयार करने में एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। इसमें देश की आर्थिक वृद्धि और प्रक्षेपण की रूपरेखा के कारणों के बारे में पूर्वानुमान शामिल हैं। 

आर्थिक सर्वेक्षण का संक्षिप्त इतिहास

पहला आर्थिक सर्वेक्षण वर्ष 1950-51 में प्रस्तुत किया गया था। 1964 तक इसे केंद्रीय बजट के साथ प्रस्तुत किया गया था। लेकिन, बाद में इसे बजट प्रस्तावों की बेहतर समझ देने के लिए केंद्रीय बजट से स्थगित कर दिया गया था। इस रिर्पोट से हटकर अगर हम बात करें बिहार के प्रति व्यक्ति आय के  आंकडों पर जो विकास का सूचक है, तो वह कुछ इस प्रकार है…

प्रति व्यक्ति आय क्या है

प्रति व्यक्ति आय को अंग्रेजी में पर कैपिटा इनकम के नाम से जाना जाता है। पर कैपिटा इनकम का मतलब किसी निश्चित क्षेत्र, देश में रहने वाली कुल जनसँख्या में प्रत्येक व्यकित की प्रत्येक वर्ष औसत आमदनी से है। पर कैपिटा का मुख्य उद्देश्य किसी देश या किसी पर्टिकुलर क्षेत्र के लोगों के धन सम्पति और उनकी इनकम में होने वाली कमी या तेजी को मापने के लिए किया जाता है। और खास तौर पर कैपिटा इनकम के इस्तेमाल से अलग अलग देश या क्षेत्र के लोगो के आमदनी में अंतर को मापा जाता है। तो अगर हम बिहार में रहने वाले लोगो के ‘प्रति व्यक्ति आय’ की बात करें आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से तो यह कुछ इस प्रकार है…
वर्ष 2004—05 : 7914
वर्ष 2005—06 : 8223
वर्ष 2006—07 : 9967
वर्ष 2007—08 : 11051
वर्ष 2008—09 : 13728
वर्ष 2009—10 : 15548
वर्ष 2010—11 : 18928
वर्ष 2011—12 : 23435
वर्ष 2012—13 : 30,930

ये आंकड़े शायद आपके उलझन को कम कर पाए, जो बीते कुछ दिनों में चर्चा का विषय रहा है। इन सभी आंकडों में इजाफा हुआ है। बहुत बड़ा ना सही, तो ये कितना तर्कसंगत होगा कहना कि बिहार पिछड़ रहा है। हांलाकि, और राज्यों से बिहार की तुलना करें या फिर बिहार के प्रति व्यक्ति आय की रैंक की बात करें तो यह संतोषजनक नहीं है। परंतु इस निरंतर प्रगति को भी हम अनदेखा नहीं कर सकते चाहे वह कितना ही धीमा क्यों ना हो।