परीक्षा पे चर्चा    

परीक्षा पे चर्चा का तीसरा संस्करण 20 जनवरी को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पे चर्चा 2020 के माध्यम से छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों से संवाद किया। उन्होंने इस चर्चा में परीक्षा के दौरान तनाव से कैसे दूर रहा जा सकता है, इसके बारे में छात्रों से विचार साझा किए। तो आइए जानते हैं कि प्रधानमंत्री ने छात्रों को क्या—क्या टिप्स दिये। 

प्वाइंट में समझें पीएम के टिप्स

  • डर के कारण आगे पैर नहीं रखे, इससे बुरी कोई अवस्था नहीं हो सकती। हमारी मनोस्थिति ऐसी होनी चाहिए कि हम किसी भी हालत में डगर आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे, ये मिजाज तो हर विद्यार्थी का होना चाहिए।

  •  विद्यार्थी कोई कालखंड के लिए नहीं होता। हमें जीवन भर अपने भीतर के विद्यार्थी को जीवित रखना चाहिए। जिंदगी जीने का यही उत्तम मार्ग है, नया-नया सीखना, नया-नया जानना।

  •  एग्जाम वॉरियर पुस्तक अवश्य पढ़ने की सलाह दी है। अगले दो दिनों में इसे दो बार पढ़ें। यह आपके सभी प्रश्नों में आपकी सहायता करेगा।

  •  अगर आप बोझ लेकर परीक्षा हॉल में गए तो सारे प्रयोग बेकार जाते हैं। आपको आत्मविश्वास लेकर जाना है। परीक्षा को कभी जिंदगी में बोझ नहीं बनने देना है। आत्मविश्वास बहुत बड़ी चीज है। साथ ही फोकस एक्टिविटी होनी जरूरी है। हम अपने कंर्फट जोन से बाहर निकलते हैं और चुनौती मोड में जाते हैं, तभी हम समझते हैं कि हम चीजें कर सकते हैं या नहीं। कैरियर बहुत महत्वपूर्ण है। सभी को कुछ जिम्मेदारी लेनी होगी। हम हमेशा अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए राष्ट्र के लिए योगदान दे सकते हैं।

  •  सुबह उठकर आप पढ़ते हैं तो मन और दिमाग से पूरी तरह तंदुरुस्त होते होंगे। लेकिन, हर किसी की अपनी विशेषता होती है, इसलिए आप सुबह या शाम जिस समय आरामदायक हों, उसी समय में पढ़ाई करो।

  •  प्रत्येक माता-पिता/शिक्षक को यह सोचना चाहिए कि जब बच्चे लगभग 4-5 वर्ष के थे तब उन्होंने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार किया। आपने उन पर दबाव नहीं डाला, आपने उन्हें प्रेरित किया। क्या आपने उन्हें चलने की कोशिश करने के लिए थप्पड़ मारा था? नहीं। मैं चाहता हूं कि माता-पिता यह स्वीकार करें कि उनके बच्चे बड़े हो गए हैं, लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि उनकी मदद करने के लिए उनका मानस कभी नहीं बदलना चाहिए और न ही दूर जाना चाहिए। मैं किसी परिजन पर कोई दवाब नहीं डालना चाहता और न किसी बच्चे को बिगाड़ना चाहता हूं। जैसे स्टील के स्प्रिंग को ज्यादा खींचने पर वो तार बन जाता है, उसी तरह मां-बाप, अध्यापकों को भी सोचना चाहिए कि बच्चे की क्षमता कितनी है। बच्चों को उनकी रुचि के सही रास्ते में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित करना चाहिए।

  •  अधिकार और कर्त्तव्य जब साथ—साथ बोले जाते हैं, तभी सब गड़बड़ हो जाता है। जबकि हमारे कर्त्तव्य में ही सबके अधिकार समाहित हैं। जब मैं एक अध्यापक के रूप में अपना कर्त्तव्य निभाता हूं, तो उससे विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा होती है।

  •  इस देश में अरुणाचल ऐसा प्रदेश है जहां एक दूसरे से मिलने पर जय-हिंद बोला जाता है। ये हिंदुस्तान में बहुत कम जगह होता है। वहां के लोगों ने अपनी भाषा के प्रचार के साथ हिंदी और अंग्रेजी पर भी अच्छी पकड़ बनाई है। हम सभी को नॉर्थ ईस्ट जरूर जाना चाहिए।

  •  दिन में कुछ ऐसा समय होना चाहिए कि आप खुद को तकनीक से दूर रखें। हर दिन एक तकनीक-मुक्त घंटा होना चाहिए। उस समय को दोस्तों, परिवार, पुस्तकों, बगीचे या पालतू जानवरों के साथ बिताएं।

  • आज की पीढ़ी घर से ही गूगल से बात करके ये जान लेती है कि उसकी ट्रेन समय पर है या नहीं। नई पीढ़ी वो है जो किसी और से पूछने के बजाए, तकनीक की मदद से जानकारी जुटा लेती है। इसका मतलब कि उसे तकनीक का उपयोग क्या होना चाहिए, ये पता लग गया।

  •  तकनीक का भय अपने जीवन में आने नहीं देना चाहिए। तकनीक को हम अपना दोस्त माने। बदलती तकनीक की हम पहले से जानकारी जुटाएं, ये जरूरी है। स्मार्ट फोन जितना समय आपका समय चोरी करता है, उसमें से 10 प्रतिशत कम कर आप अपने मां, बाप, दादा, दादी के साथ बिताएं। तकनीक हमें खींचकर ले जाए, उससे हमें बचकर रहना चाहिए। हमारे अंदर ये भावना होनी चाहिए कि मैं तकनीक को अपनी मर्जी से उपयोग करूंगा।

  •  यदि आप पढ़ाई के अलावा कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं करेंगे, तो आप एक रोबोट की तरह बन जाएंगे। क्या हम चाहते हैं कि हमारा युवा रोबोट में बदल जाए? नहीं, वह ऊर्जा और सपनों से भरे हुए हैं।

  •  2001 में भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज याद है? हमारी टीम को असफलताओं का सामना करना पड़ रहा था और मूड अच्छा नहीं था। लेकिन, हम यह कभी नहीं भूल सकते कि राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने कैसे मैच को पलट दिया। यह सकारात्मक सोच और प्रेरणा की शक्ति है।

  •  सिर्फ परीक्षा के अंक जिंदगी नहीं हैं। कोई एक परीक्षा पूरी जिंदगी नहीं है। ये एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन, यही सब कुछ है, ऐसा नहीं मानना चाहिए। मैं माता-पिता से भी आग्रह करूंगा कि बच्चों से ऐसी बातें नहीं करें कि परीक्षा ही सब कुछ है।

  •  क्या कभी हमने सोचा है कि मूड आफ क्यों होता है? अपने कारण से या बाहर के किसी कारण से। अधिकतर आपने देखा होगा कि जब मूड आफ होता है, तो उसका कारण ज्यादातर बाह्य होते हैं।

  •  जैसे आपके माता-पिता के मन में 10वीं, 12वीं को लेकर टेंशन रहती है, तो मुझे लगा आपके माता-पिता का भी बोझ मुझे हल्का करना चाहिए। मैं भी आपके परिवार का सदस्य हूं, तो मैंने समझा कि मैं भी सामूहिक रूप से ये जिम्मेदारी निभाऊं।