सैलरी

आज भी नमिता अपने सहकर्मियों के साथ व्यस्त थी। ऑफिस का काम घर पर लाना उसकी मजबूरी कहें या शौक, लेकिन यह आए दिन होता था। ऊर्जा से भरपूर नमिता का चेहरा काम पूरा होते ही हमेशा की तरह मुरझा गया। सहकर्मी चले गये तो वह घरेलू काम की ओर अग्रसर हुई। वीडियोगेम खेल रहे बेटे ने आज मम्मी से कोई शिकायत नहीं की, अन्यथा वह अक्सर उसे अपने साथ खेलने के लिए जिद करता था।
नमिता ने खाना बनाया और लाकर उसे खिलाने लगी, मगर आधा ध्यान मोबाइल पर आ रहे संदेशों पर था। बीच-बीच में फोन भी आ जाते। बेटा गौर से उसे देख रहा था। खाना खाते-खाते वह अचानक दौड़ के भागा और दूसरे कमरे से मुट्ठीभर सिक्के ले आया। नमिता उसे खाना खाने के बीच से उठने के लिए डांट लगाने ही वाली थी कि वह बोल उठा, “मम्मी, तुमको ऑफिस से सैलरी मिलती है, इसलिए तुम ऑफिस के काम में ही मन लगाती हो, आज मैंने अपनी गुल्लक तोड़ दी है, अब हर महीने मैं भी तुमको सैलरी दूंगा, मेरे साथ भी उतने ही मन से खेलो।”
नमिता की आंखों में आंसू आ गये। उसने मोबाइल स्विच ऑफ किया और उसे गोद में बैठाकर खाना खिलाने लगी और कहा, “खाने के बाद मैं और तुम साथ खेलेंगे वीडियोगेम।”

परिचय
रचनाकार – कुमार गौरव अजीतेन्दु  
विगत सात वर्षों से लेखन। साहित्य की सभी विधाओं में रुचि। पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाओं का प्रकाशन।
निवास
शाहपुर (ठाकुरबाड़ी मोड़ के पास), दाउदपुर (पोस्ट),
दानापुर (कैन्ट), पटना – 801503, बिहार
ई-मेल – kumargauravajeetendu@gmail.com