चाहत

न ज़मीन चाहिए, न आसमान चाहिए,
इन्हें तो बस थोड़ा सा सम्मान चाहिए..
चाह नहीं खोखले इबादतों की,
ज़रूरत नहीं दिखावटी खुशामदों की,
ज़रा पढ़ के तो देखिये,
इनकी चाहतों को,
इन्हें तो आपकी आँखों में,
अपने लिए,
बस प्यार के कुछ निशान चाहिए..
न ज़मीन चाहिए, न आसमान चाहिए,
इन्हें तो बस थोड़ा सा सम्मान चाहिए..
ऊँची अट्टालिकाएं लगती नागवार,
फीके लगते आलीशान बाज़ार,
जहाँ न हो, दीवारें अपनों के बीच,
मिट्टी का ही सही,
इन्हें छोटा सा मकान चाहिए.
न ज़मीन चाहिए, न आसमान चाहिए,
इन्हें तो बस थोड़ा सा सम्मान चाहिए..
ज़रा महसूस तो कीजिये इनकी सर्द आहों को,
टटोल कर तो देखिये, इनकी दर्द भरी निगाहों को,
बस यही कहती हैं, इनकी आँखों की नमी,
कि इन्हें,
नहीं घर का कोना बियाबान चाहिए..
न ज़मीन चाहिए, न आसमान चाहिए,
इन्हें तो बस थोड़ा सा सम्मान चाहिए.
जिन्हें पापा-दादा बोल के बोलना सिखाया,
उनकी बोलों में प्यार की तान चाहिए,
अपने ग़मों की परवाह किये बिना,
जिन पर खुशियाँ वार दी,
उनके दिलों में थोड़ा-सा स्थान चाहिए
न झूठी शान चाहिए,
और न कीमती सामान चाहिए,
इन्हें तो बस,
संवेदनशील समाज की इज्ज़त भरी अज़ान चाहिए.
न ज़मीन चाहिए, न आसमान चाहिए,
इन्हें तो बस थोड़ा सा सम्मान चाहिए..
– कुमार रौनक
शिक्षा तरु, पटना
लेखक केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो, पटना में निरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। सामाजिक उत्थान की दिशा में निरंतर सकारात्मक प्रयास करने वाले रौनक एक सामाजिक संस्था ‘शिक्षा तरु’ के माध्यम से वंचित और असहाय बच्चों की शिक्षा में भी अहम योगदान दे रहे हैं।