इतिहास एक ऐसा दस्तावेज है, जो हमें अपने अतीत से अवगत कराता है। यही वह चीज है जो हमारे अतीत को हमारे लिए संभाले रखता है। इसलिए हमें इसे समृद्ध करना चाहिए। ये बातें सामने आईं कालेज ऑफ कामर्स आर्ट्स एण्ड साइंस, पटना के सभागार में। मौका था ‘स्थानीय इतिहास और इतिहास लेखन’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का।
सोमवार का इस सेमिनार का समापन हुआ। आइसीएचआर द्वारा प्रायोजित इस सेमिनार का आयोजन इतिहास संकलन समिति बिहार और काॅलेज के इतिहास विभाग द्वारा किया गया। इस सेमिनार में देश भर के 400 प्रतिभागी शामिल हुए। दो दिवसीय सेमिनार के नौ सत्रों में 172 रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया गया। इसमें 86 पेपर्स को पढ़ा गया। प्रो अविनाश ने बताया कि स्थानीय इतिहास लेखन से भारतीय इतिहास को नया आयाम मिलेगा।
इस अवसर पर प्रिंसिपल डाॅ. तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि इतिहास लेखन में हैव और हैव नाॅट के बीच बड़ी खाई है, इसे पाटने की जरूरत है। साथ ही इतिहास के महत्व के बारे में लोगों को अवगत कराया जाए। सेमिनार के आखिरी निष्कर्ष पर विद्वानों ने महसूस किया कि अबतक विदेशियों के दृष्टिकोण से इतिहास लेखन होता रहा, जिसके चलते भारतीय इतिहास गौण रहा है।
सेमिनार में भागलपुर यूनिवर्सिटी के प्रो राजीव कुमार सिन्हा, पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी के प्रो. रामकिशोर सिंह तथा बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग की सदस्य प्रो उषा प्रसाद की उपस्थिति प्रमुख थी। डाॅ संजय पासवान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। प्रो राजीव रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन किया। मंच का संचालन प्रो अनिता ने किया। मौके पर डाॅ. राजेश शुक्ला, डाॅ मीता, शैलेश कुमार, डाॅ रामाकांत शर्मा भी उपस्थित थे।