राजधानी एक्स्प्रेस

बेशक मेट्रो सिटी में रहते हुए
शुरुआती दिन ही गुजरे थे
पर, दौड़ती भागती जिंदगी में पॉज़ बटन को दबा कर
लौटा था गांव को,
ओस से भीगे,
गेहूं की सोंधी बालियों से लदे खेतों के बीच से
भाग रहा था पगडंडियों पर
बेशक ये यात्रा हो चुकी है, अतीत में खोयी बात
पर यूंही स्मृतियों ने दिलाया याद कि
कैसे दरवाजे पर ही दिखी
अम्मा बाबा के आंखों की चमक
और फिर होने लगी बैठकी
अतीत में जुड़े दोस्तों के साथ
जिनके साथ बेरोजगारी के दिनों मे
खेले थे कंचे, तो
कभी असली क्वीन ढूंढते हुए
कैरम के क्वीन के लिए आजमाए थे हाथ
सोंधी हवा वाले अहसासों से भरे गांव में
टूटी सड़कों पर जल जमाव से बचते हुए
गुज़रते हुए गलियों में,
अनेकों दलानों को पार करने के क्रम में
छूता रहा पैर,
पाता रहा आशीष बुढ़ाती हथेलियों के स्पर्श से
थी कोई चाची तो कोई दादी तो अन्य बुजुर्ग भी
जिंदगी के आसमान को
फिर से सिकुड़ी हुई स्थिति में देखना
था बेहद अजब, महसूसता रहा भीगते हुए क्योंकि
कुछ भीगी नजरों ने बताया दिन बदले
दूरियां अंतर्निहित हुई पर
नहीं बदली अहमियत
भौजियों ने बनाई चाय, पूछ बैठी
अबकी होली किसके चेहरे पोतोगे बबुआ
बड़े शहर की चढ़ गई है तुमपर चमक

एक मोड़ पर मिली
लाल फ्रॉक वाली लड़की जिसके चहरे पर
अब फब रही थी गुलाबी साड़ी,
सीधे पल्ले में आगे से खोंसी हुई
शायद आई थी अपने मायके
अनावृत कमर नहीं छिप पाई थी, उस आँचल में भी
तभी तो मुस्काते हुए तंज में कह गई
तुम काहे नहीं बदलोगे रे, नजरें तो सही रखो अब

मुस्कुराई कुछ वो प्रेमिकाएं भी
जो गाँव से शहर जाते हुए रही कई बार साथ
कभी नदिया के पार की गूँजा सी
तो लैला सी दिखी थी कभी
अब मुटल्ली सी हस्तियों में संभाल रही थी
बच्चो के निक्कर और दूध की बोतलें
रिवाईंड-फॉरवर्ड सा गुजरता रहा
एक अलग ही विडियो रिकॉर्डर वाली दुनिया में

गुजरता रहा शिवाला से तो
बैठा कई बार चौक के चाय वाले खोखे पर
बंटती रही एक बटा दो या दो बटा तीन की ग्लास,
हम सब के बीच
पुछते रहे सभी जिंदगी की परेशानियाँ या  
राजनीति के अंदर की बात
जैसे दिल्ली में हर कोई होता है सरकार के करीब
गलबहियां डाले हुए मैं भी पूछता रहा सबको
क्या कर रहे हो इनदिनों

कुछ उम्मीदों भरी नजरों ने निहारा
कह ही बैठे, धीरे से
हमे भी बुलाओ न दिल्ली
गांव मे नहीं रहा कोई काम
आखिर कब तक गुजारें दिन

लौट रहा था  
राजधानी एक्सप्रेस के दरवाजे से लटका हुआ
कुछ न कर पाने के कसक के साथ
कह रहा था कई दोस्तों को एक साथ
भेजना अपना बायोडाटा
अबकी पक्का पक्का करवाऊँगा कुछ काम
बेशक पुतलियों से झांक रही थी
अपनी असली असलियत !

खैर! खुश होने के बहाने जरूरी हैं
कुछ मेरे लिए, कुछ मेरे दोस्तों के लिए!

एक्वारजिया

‘एक्वारजिया’
या करूँ उसका अनुवाद तो
अम्लराज! या शाही जल!
पर, अम्लरानी क्यों नहीं ?

ज़िन्दगी की झील में
बुदबुदाते गम
और उसका प्रतिफल
जैसे सांद्र नाइट्रिक अम्ल और
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का ताजा मिश्रण
एक अनुपात तीन का सम्मिश्रण
उफ़! धधकता बलबलाता हुआ
सब कुछ
कहीं स्वयं न पिघल जाएं
दुःख दर्द को समेटते हुए

जैसे लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के उस पार से
ताक रहा पाकिस्तान
और फिर उसकी ताकती नज़रों से
खुद की औकात दिखाते
कुलबुलाते कुछ कीड़े इस पार
वही तीन अनुपात एक जैसा ही
और फिर ऐसे ही एक असर का नतीजा
आखिर
क्यों नहीं समझ पाते हम
रोकना ही होगा इस सम्मिश्रण के
कनेक्शन को

रूमानी शब्दों में कहूँ तो
तुम और तुम्हारी नज़र
वही ख़ास अनुपात
कहर बन कर गिरती है मुझपर
अम्लीय होती जिंदगी में
खट्टा खट्टा सा
नमकीन अहसास हो तुम

द्रवीय अम्लराज का दखल
जिंदगी के हर परिपेक्ष्य में
अलग अलग नज़रिये से
फिर से बस यही सोच
कहीं पिघल न जाऊं !!

स्टिल आई लव हर

‘प्रेम कवि’
जिंदगी के बुनियादी उतार-चढ़ाव से इतर
मानसूनी हवाओं से होकर बेअसर
होती है एक ऐसी शख़्सियत

जो इन झंझावातों के बीच
ख़्वाबी ताजमहल के
सबसे निचले तहखाने में
नूरजहां के मकबरे के
पैरों वाली दिशा में
जलते लोबान की सुगंध में
करे कोशिश
अपनी दूसरी नंबर वाली प्रेमिका के साथ
बिताए गए ब्रेकअप से पहले का क्षण का
और चिल्लाते हुए, शब्दों में करे याद
पहले प्रेमिका के दूसरे बॉयफ्रेड को

बेवजह ढलकाए आंसू
और फिर
वहां जलते दीपक को धीरे से फूंकते हुए कहे
कमीने, क्यों ले भागा उसको
“सच्ची, आई स्टिल लव हर” !

प्रेम कवि
वास्तविक प्रेम से अलहदा
करता है प्रेम
प्रेमिका के प्रस्थान के बाद
यादों में प्रेम करना और
फिर शब्दों में गढ़ना ही
शायद है प्रेम!
प्रेम तो फतंगो का ही होता है अमर
आखिर जलन से होती मृत्यु
फिर भी यादों में जलना और
दीपक के लौ में आहुति देना है न प्रेम

हां है न सच कि
‘लव यू’ से ज्यादा बहता है प्रेम
‘स्टिल आई लव हर’ – में

जिंदगी से परे है प्रेम।

बूंदें

बारिश की बूंदें
हल्के मेंगो शॉवर जैसी
बादल से उतरकर
तुम्हारे दूब-देह से मिलेंगीं
बदल जाएंगी मोती में
खिलखिलाती हुई छमकेगी नाभि पर

केशो से उलझकर मोगरा बनेंगी
सुवासित कर देंगी धरा गगन,
उस भीगे केशराशी को
कि कैसे वो जवा कपोलों को
ढक लेगी स्नेहिल स्पर्श के साथ
जिन्हे चाहूंगा फूंक कर हटाना

कुछ बूंदें ठहर जाएंगी
तुम्हारे गालों के गड्ढों में
अठखेलियों से बज उठेगा मधुर संगीत
झंकृत कर देगा मन के क्षितिज को
एक बूंद रुकेगी होंठ पर
जिसके प्रिज्मीय आवरण में
चमकेगी मेरी तस्वीर
चुपके से होंठो को तिरछा कर
तुम गटक लेना वो बूंद, ताकि
थम जाऊंगा तुम में इस तरह

तुम्हारे माथे के बीचोबीच ठिठकी
एक बूंद
चमक उठेंगी बिंदी की तरह
जैसे तुम्हारा चमकता आत्मसम्मान
दिखती हो सबसे अलग
बूंदों सी लरजती आंखे हर पल
बुलाती है कहती है आ भी जाओ न

कुछ बूंदे
गर्दन से उतरती
मन की गहराइयों तक पहुंचेंगी
जहां अंकुरित होगा अनुराग
गहराईयों को नापती
रुकती ठहरती फिसलती बहेंगी
देखना चाहता हूं सब तुम में
बहते, रुकते, पार उतरते हुए
राग के हर पड़ाव को
आत्मा की स्वर्णिम बिंदु तक

मुझे महसूसना है
वो हर पड़ाव
जो है तुममे
जो फिसलते हुए पहुंचाता है
मुझे अपने चरम की स्थिति तक
हां, उसे चूम अमर होने के भाव से कांपेंगी
बहेंगी मोक्ष की नदी

बूंदें जब कभी बरसे हरहरा कर
तब देखना है मुझे
चेहरे को, सुर्ख गालों को
और महसूसना है
बाहुपाश में स्वयं को
ताकि पिघलती बूंदे उतरती हुई ग्रीवा से
जा पहुंचे दिल के छोटे-छोटे कंदराओं में
तब तुम भींच कर कहना
बूंद के माफिक समाहित हो जाओ न मुझ में

कुछ बूंदें
वहां से भी सिहरते हुए जाना चाहेगी
आत्मा के स्वर्णिम बिंदु तक
चूम कर अमर होने के भाव से झूम उठेंगी
और मोक्ष के सरिता में समा जायेंगी
काश, बूंदों के आदान-प्रदान से
बहते हुए बह जाएं और फिर
ठिठक कर रुकें, झांके नजरों में
जिससे तेज सांसों से उठे ज्वार उस समय

बूंदों से बनती नदियों की तरह
तुम भी बह जाना मुझमें
आखिर संगम तो नियति है
और हर संगम के बाद की स्थिरता
है एक प्यारी जिंदगी!

मुकेश कुमार सिन्हा
— 1971 में बिहार के बेगूसराय में जन्म। झारखंड के देवघर से स्नातक और अब दिल्ली के सरकारी कार्यालय में जीवनयापन।
कविता संग्रह : हमिंग बर्ड (हिन्दयुग्म प्रकाशन)
लप्रेक : लाल फ्रॉक वाली लड़की (बोधि प्रकाशन)
सह-संपादन: कारवां, 100कदम, गूंज, तुहिन, गुलमोहर, पगडंडियां, कस्तूरी ( कुल 300 से अधिक रचनाकार शामिल) (सभी हिन्दयुग्म प्रकाशन)
ब्लॉग: jindagikeerahen.blogspot.com (वर्ष 2019 का ब्लॉगर ऑफ द इयर का उप विजेता)