मित्रता 

किसी को याद आऊँ, बनकर एक सपना
कोई तो हो, जो कह सके मुझे अपना
आज भुला बैठा है, मुझको मेरा यार
किस को कहूँ, कैसे कहूँ कहाँ गया वह प्यार
बचपन के थे सुहाने दिन, मस्ती भरी यादें
खायी थी कसमें पर, भुला गये सब वादे
लौट कर आ जाओ न, करो कोई तकरार
किस को कहूँ…
रिश्ते-नाते होते हैं पर, एक रिश्ता दोस्ती का है,
आपस के सुख-दुख एक, और रिश्ता मस्ती का है,
कैसे भुला गये तुम्हारे आने से आती है बहार…
किस को कहूँ…
भौतिकता के युग में, रिश्ते बेमानी होते हैं.
भुला देते सब शिकवे-गिले, सच्चे मित्र जो होते हैं,
माना मुझसे भूल हुई, क्षमा दे दो दिलदार…
किस को कहूँ…

आईं बहारें

जिन्दगी फिर से मुस्कुराई है,
जीने की फिर वजह जो पाई है।
इस वीरान पड़े गुलशन में,
एक नन्हीं कली खिल आई है…
जिसकी खुशबू से सुवासित है चमन-3
उसकी सुन्दरता मन को भाई है…।
जिसके खिलते ही आ गई बहार-3
सूखे होठों पे हँसी आई है…।
कोई पूछता न था, जिस बगिया को-3
तितलियाँ फिर से वहाँ आई हैं…।

परिचय : 
नाम- मधुरेश कांत शरण
साहित्यिक नाम – मधुरेश नारायण
शैक्षणिक योग्यता – M.Com.
कार्य क्षेत्र – भारतीय स्टेट बैंक (सेवानिवृत्त)
ईमेल – madhuresh.sharan@gmail.com
2D-गोविंद एन्क्लेव
डॉ राम गोविंद सिंह पथ, कंकड़बाग
पटना — 800020