1 गंगा में जलते हैं असंख्य दीये
ख्वाहिशे हजार वाट की आँखों में जलती हैं।
जैसे गंगा में जलते हैं असंख्य दीये
गंगा आरती के आलाप के साथ ख्वाहिशे मन्नतों में बदलने लगती हैं।
मन्नतें फांसी बन जाती हैं..जब बुधिया खेती करते कर्ज में डूब जाता है।
बाबुल मोहे काहे को ब्याहे विदेश..
ख्वाहिशों के दिये कुछ किनारे, कुछ बीच धार डूब जाते हैं
मुनिया की हसरतें छ्प्पर पर रख दी गई है।
बरसात में एक दिन बहा देगी
कुछ चुल्हें की आग में झोंक देगी खुद ही
कहीं टूटा है तारा
कई होंठ बुदबुदातें हैं अनायास
ख्वाहिशे फिर कहीं जागी है हौले हौले
अबकि बारिश हरी कर गई है हसरतें
बो गई है कई सपने
जगा गई हैं उमंगे

2.स्मृतियाँ
कुछ होती हैं स्मृतियाँ
जो कभी होती नहीं विस्मृत
जिसकी झोली में होती है
घर, आँगन, चौखट, तुलसी
खनकती चूड़ियाँ, बजते पायल
गौरैया का शोर
और रोटी से उठती सोंधी गंध
जो भुलाये नहीं भूलता
क्योंकि इन सबसे जुड़ी होती हैं।
माँ की यादें!

3.तुम्हारा मौन
तुम्हारा मौन विचलित करता है
मेरे मन को!
सुनना चाहती हूँ तुम्हें……
मुखर हो जाती हैं
खिड़कियाँ, पर्दे, दीवारें
कुर्सियां, टेबल, चम्मचे, दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे…

4.
तुम नहीं थे
कहीं भी नहीं
जब भी मैंने आवाज लगाई
लौटकर मेरे ही पास आ गई
इंतजार की आदत छूट गई
अब तो
मैंनें अपने आपसे प्यार करना सीख लिया है

5.
शब्दों की पगडंडियों पर चलकर देखा
कई बार ये भटकाती हैं।
उलझाती भी हैं।
एक प्रेम ही है जो बचा ले जाती है।
अत: जरुरी है प्रेम करते रहना

6.
ओ हृदय तुम बुद्ध ही रहना
करुणा के अजस्त्र स्त्रोत
प्रेम के तुम्ही द्वार
दूर्वासा बनी जिव्हा क्यूँ ले रही प्रतिकार
कैसी मुक्ति कैसा प्रहार
अपनों पर कर के वार

7.
स्त्री कहाँ सोच पाती है
मृत्यु कैसे होगी?
मरने के बाद क्या होगा
उसे मोक्ष मिलेगा या नहीं?
हर रोज मर के जीने वाली स्त्रियों से पूछा है कभी
वो मर के स्वर्ग जाना चाहेगी क्या?
स्वर्ग भी तो बनाया है पुरुषों ने पुरुषो के लिए न
जहाँ उर्वशी, रम्भा, और औरो के लिए हूरें इंतजार में पलकें बिछाए बैठी हैं…

8. तुम्हारे साथ
ओ तरुणी!
तार तार हैं सपनें तेरे
रोम रोम में जहर भर गए
कुंठित होगा मन का कोना
घृणा के ज्वार पर तुम सवार
बदले की आग में भी जलोगी
ओ मेरी अनजान सखी!
एक विनती मेरी बस सुन लो
आसुंओ की काल कोठरी में जीवन मत खोना
गमो की पोटली मत ढोना
विवश हो आत्महत्या मत करना
ओ दामिनी
सच मानो!
तप कर तुझे सोना है बनना
कल तक जो भी सपने थे तेरे
भूल उसे अब आगे बढ़ना होगा।
लाचार तुम नहीं ,व्यवस्था पंगु है।
पहचान अपनी शक्ति को
तुझे ध्रुव तारा सा चमकना होगा
पोंछ कर सारी तस्वीर
दे अपनी तरुणाई को नया आधार
चुन नए पथ को
रख मजबूती से
अपने कदमो को
नाप नया आकाश!
तुम जानो या ना जानो
मानो या ना मानो
हमारी दुआएं
है तुम्हारे आसपास
तुम्हारे साथ!

महिमाश्री
स्वतंत्र लेखन
एकल काव्य संग्रह- ‘अकुलाहटें मेरे मन की, 2015, अंजुमन प्रकाशन
पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉगस में कविताएं, गज़ल और लेख , लधु कथा प्रकाशित
मेल आईडी- mhmrani@mail.com